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ग़ज़ल - सदफ़ के गौहर

वज़्न-2122 1122 1122 22/112

 

अज़्म से जो भी समेटेगा हदफ़* के गौहर                                             [ हदफ़ - लक्ष्य
ज़िंदगी में वही पाएगा शरफ़* के गौहर                                                [ शरफ़ - सम्मान 

 

इश्क़ है उनको भी हमसे ये हमें है मालूम
हमने देखे हैं उन आँखों में शग़फ़* के गौहर                                           [शग़फ़ - दिलचस्पी

  

हाथ में हाथ ले तुमने जो उठाए थे कभी
मेरे दिल में हैं अभी तक वो हलफ़* के गौहर                                          [हलफ़ - क़सम

 

तुमने दरिया के किनारे जो दिए थे मुझको
अब भी महफ़ूज़ हैं वो सारे ख़ज़फ़* के गौहर                                          [ख़ज़फ़ - पत्थर के टुकड़े

 

वस्ल के लब पे तबस्सुम की ज़िया देखी तो
कितने बेनूर हुए थे वो सदफ़* के गौहर                                                  [सदफ़ - सीप 

 

सादगी इल्म हुनर अज़्म उमीद और हिम्मत
हमने रक्खे हैं क़रीने से सलफ़* के गौहर                                                [सलफ़ - बुज़ुर्ग 

 

’आरज़ू' एक ही ताउम्र बशर ने की है
होश के साथ सलामत रहें दफ़* के गौहर                                                [दफ़ - तेज़ी, जोश

 

 

-©अंजुमन 'आरज़ू'✍️ 

 

(स्वरचित एवं अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2021 at 7:30pm

आदाब।.बढ़िया ग़ज़ल के साथ आग़ाज़ हेतु मुबारकबाद।। कठिन शब्दों के म'आनी सबसे अंत में लिखना बेहतर लगेगा शे'अर का नंबर लिखते हुए।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 13, 2021 at 5:50pm

आदरणीय नाथ सोलंकी जी सादर नमन, हार्दिक आभार कि आपने मेरा इस्तकबाल किया और ग़ज़ल पसंद की, कुछ कठिन शब्दों के म'आनी लिखे तो  है मैंने, सादर

Comment by नाथ सोनांचली on October 13, 2021 at 4:04pm

आद0 अंजुमन "आरजू" जी सादर अभिवादन।

ओ बी ओ पर आपका स्वागत है। बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने। कठिन शब्दों के मआनी लिख देने से हम जैसे लोगों को अशआर समझने में आसानी होगी

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 12, 2021 at 5:33pm

आदरणीय सौरभ पांडे जी आदाब
ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़जाई करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया
जी, पटल पर नई हूं और अभी इसे ऑपरेट करना सीख रही हूं


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 12, 2021 at 5:24pm

आदरणीया अंजुमन आरज़ू जी,

आपका इस पटल पर स्वागत है. आपने कठिन शब्दों के काफिये पर ग़ज़ल निभाने की कोशिश की है और कामयाब भी रही हैं. दाद स्वीकार करें. 
 
सादगी इल्म हुनर अज़्म उमीद और हिम्मत
हमने रक्खे हैं क़रीने से सलफ़* के गौहर ..   ... . बहुत खूब ! 

शुभ-शुभ

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 10, 2021 at 11:17am
मुहतरम dandpani nahaj जी, मुहतरम लक्ष्मण धानी मुसाफिर जी, मुहतरम बृजेश कुमार ब्रज जी ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़जाई करने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2021 at 9:39am

बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीया...बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2021 at 8:35am

आ. अंजुमन जी, सादर अभिवादन । सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 2, 2021 at 9:05am
  1. जनाब अमीरुद्दीन अमीर साहब आदाब, ग़ज़ल की पज़ीराइ के लिए तहे दिल से शुक्रिया, जहां तक म'आनी की बात है तो इस प्लेटफार्म पर यह मेरी पहली प्रस्तुति है, इसे ऑपरेट करने में मुझे अभी थोड़ी दिक्कत हो रही है, इसलिए यह ग़लती हुई, एमएस ऑफिस में मिस्रा ख़त्म होने के बाद काफ़ी स्पेस देकर मैंने म'आनी लिखे थे, जैसे किताबों में होते हैं, लेकिन यहां आकर सारे स्पेस ख़त्म हो गए, मैंने एडिट करने की कोशिश भी की लेकिन हो नहीं सका । अभी फिर से कोशिश करती हूं, अगली ग़ज़ल में यह ग़लती नहीं होगी, बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 2, 2021 at 8:56am

उस्ताद मुहतरम समर कबीर साहब आदाब, आपकी नवाज़िशों का तहे दिल से शुक्रिया

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