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ग़ज़ल नूर की - तमन्नाओं को फिर रोका गया है

तमन्नाओं को फिर रोका गया है
बड़ी मुश्किल से समझौता हुआ है.
.
किसी का खेल है सदियों पुराना
किसी के वास्ते मंज़र नया है.
.
यही मौक़ा है प्यारे पार कर ले
ये दरिया बहते बहते थक चुका है.
.
यही हासिल हुआ है इक सफ़र से  
हमारे पाँव में जो आबला है.
.
कभी लगता है अपना बाप मुझ को  
ये दिल  इतना ज़ियादा टोकता है.
.
नहीं है अब वो ताक़त इस बदन में
अगरचे खून अब भी खौलता है.
.
हम अपनी आँखों से ख़ुद देख आए
वहाँ बस तीरगी का सिलसिला है.
.
बहुत सी लडकियाँ मरती हैं उस पर
वो लड़का, हाँ वही जो साँवला है.
.
ग़ज़ल में “नूर”! वो सब तू सुना दे
तेरे जीवन में जो कुछ अनकहा है.
  .
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2025 at 5:38pm

धन्यवाद आ. रवि जी ..बस दो -ढाई साल का विलम्ब रहा आप की टिप्पणी तक आने में .
क्षमा सहित..आभार 

Comment by Ravi Shukla on December 20, 2022 at 1:40pm

वाह वाह नीलेश जी बहुत शान दार ग़ज़ल कही है आपने शेर दर शेर मुबारकबाद कुबूल करिये । एक के बाद एक  उम्दा शेर हुआ है ।  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2021 at 6:12pm

धन्यवाद आ. आरज़ू जी  

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on November 3, 2021 at 11:07am

आदरणीय नीलेश नूर जी आदाब, बहुत शानदार ग़ज़ल की दिली मुबारकबाद कुबूल फ़रमाएँ,  आदरणीय चेतना प्रसाद जी की प्रतिक्रिया से सहमत

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 27, 2021 at 7:32am

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 27, 2021 at 7:31am

धन्यवाद आ. सालिक जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 27, 2021 at 7:31am

धन्यवाद आ. बृजेश जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2021 at 7:27am

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन गज हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by सालिक गणवीर on October 24, 2021 at 7:49pm

भाई  Nilesh Shevgaonkar जी
सादर प्रणाम
बहुत दिनों बाद पटल पर आपकी ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया। आपकी शैली मुझे बहुत भाती है. ग़ज़ल पर गुणीजनों की टिप्पणियाँ पढ़ते हुए ही नई जानकारियां भी मिल गई। सलामत रहें।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 17, 2021 at 4:55pm

एक अलग ही अंदाज की ग़ज़ल पढ़ने को मिली आदरणीय नीलेश जी..और उसपे हुई चर्चा बड़ी महत्वपूर्ण है।

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