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रद्दी - लघुकथा - 

"अरे, ये क्या, सारी की सारी पुस्तकें वापस  लेकर आ गये।" 

"क्या करूं पुष्पा, तुम ही बताओ? पूरा दिन बाजार में घूमता रहा इतना भारी इतनी कीमती पुस्तकों का बैग लेकर, लेकिन कोई दुकानदार खरीदने को तैयार नहीं।" 

"ऐसे कैसे, कितनी काम की पुस्तकें हैं। वर्मा जी तो आपके पुराने मित्र हैं। उनसे बात नहीं की।

"उसके पास भी गया था।दोस्ती की दुहाई भी दी। मैंने उसे बताया कि मेरे बेटे को  ऑन लाइन पढ़ाई के लिये मोबाइल दिलाना है। इन पुस्तकों की आधी कीमत ही दे दो तो मेरा काम चल जायेगा। अभी मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। लेखकों के बारे में तुमसे कुछ भी छिपा नहीं है।

"लेकिन एक जमाने में तो आपकी किताबें हाथों हाथ बिक जाती थीं।

"वह वक्त और था पुष्पा, जब पुस्तकों की मांग थी। आजकल सब कुछ इन्टर नैट पर मिल जाता है।

"अब क्या करोगे?" 

"कल  वर्मा का नौकर आयेगा। और सारी पुस्तकें तौल कर रद्दी के भाव ले जायेगा।" 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on November 11, 2021 at 3:35pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी आदाब, अच्छी सम-सामयिक लघुकथा हुई है, बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 11, 2021 at 1:26pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। सुंदर लघुकथा हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 5, 2021 at 7:34pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी।आदाब।

Comment by Samar kabeer on November 4, 2021 at 3:18pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब, अच्छी लघुकथा लिखी आपने, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 1, 2021 at 10:43am

हार्दिक आभार आदरणीय सुशील सरना जी।

Comment by Sushil Sarna on October 31, 2021 at 8:30pm
वाहहहहहह आदरणीय यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई सर
Comment by TEJ VEER SINGH on October 31, 2021 at 7:07pm

हार्दिक आभार आदरणीय शेख़ शहज़ाद साहब जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 31, 2021 at 3:50pm

वाह। /वर्मा का नौकर आयेगा।/, /आधी क़ीमत/... बढ़िया तंजदार लघुकथा। हार्दिक बधाई आदरणीय तेजवीर सिंह जी। शीर्षक नये भी लिये जा सकते है तदनुसार। सादर।

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