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तिनका तिनका टूटा मन(गजल) - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२/२२/२२/२


सोचा था हो बच्चा मन
लेकिन पाया  बूढ़ा मन।१।
*
नीड़  सरीखा  आँधी  में
तिनका तिनका टूटा मन।२।
*
किस दामन को भाता है
सारी  रात  बरसता  मन।३।
*
तन की मंजिल पास हुई
मीलों  लम्बा  रस्ता  मन।४।
*
शूल चुभा  सब  कहते हैं
मत रख पत्थर जैसा मन।५।
*
पीर  अगर  नाचे आँगन में
तब किसका घर होगा मन।६।
*
कहकर कितना रोयें अब
दुख में भी मुस्काता मन।७।
*
उम्मीदों  की  गठरी धर
क्यों होता है हल्का मन।८।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2022 at 9:29pm

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Ravi Shukla on December 20, 2022 at 1:27pm

आदरणीय लक्षमण जी छोटी बहर में अच्छी ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्वीकार करें 

Comment by Samar kabeer on December 15, 2022 at 5:21pm

'पीर  जो  नाचे आँगन में'

अब ठीक है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 15, 2022 at 6:24am

आ. भाई आजी तमाम जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार।

इंगित मिसरे को इस प्रकार देखें- "पीर  जो  नाचे आँगन में' 

Comment by Aazi Tamaam on December 14, 2022 at 4:06pm

आ आपकी ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद आती है आ

बहुत सुंदर लिखते हैं

बधाई हो

गुरु जी की इस्लाह सर आँखों पर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2022 at 4:03pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2022 at 4:02pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति , उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन के लिए आभार। 

इंगित मिसरे को इस प्रकार देखें- "पीर  जो  नाचे आँगन में' 

Comment by Samar kabeer on December 14, 2022 at 3:05pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें इबादत I 

'पीर  अगर  नाचे आँगन में' --- इस मिसरे में एक 2 अधिक है, देखें I 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 13, 2022 at 6:30pm

छोटी बह्र की बढ़िया ग़ज़ल हुई आदरणीय धामी जी...सादर

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