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बाल गीत: लंगडी खेलें..... -संजीव 'सलिल'

*
बाल गीत:

लंगडी खेलें.....

आचार्य संजीव 'सलिल'
*
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*************

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Comment

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Comment by guddo dadi on September 6, 2010 at 10:53am
बिटवा भाई
चिरंजीव भवः
बचपन के दिन भी क्या दिन थे हँसते गाते
याद आगया बचपन खूब खेला करते थे
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on September 4, 2010 at 6:54am
आचार्य जी प्रणाम,

ये बाल गीत बहुत ही पसंद आया मुझे...अपने गाँव में जाकर ऐसे खेल खेलने में बच्चो के साथ बहुत ही मजा आता है....और आपने तो इस गीत के माध्यम से बैठे बैठे वो दिन याद दिला दिया...
बहुत ही बढ़िया गीत है.....
Comment by आशीष यादव on September 4, 2010 at 2:07am
sarwapratham aapko mera pranaam,
aap ka yah baal geet mujhe behad pasand aaya. ghar jata hu to kabhi kabhi chhote bachcho ke sath khel leta hu.
Comment by sanjiv verma 'salil' on September 3, 2010 at 9:38pm
श्री कृष्ण जी स्वयं शारीरिक खेलों के महारथी थे. उनके जन्म दिवस पर बाल-गोपालों को इन खेलों से जोड़ने का यह प्रयास आपको पसंद आया. धन्यवाद.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 3, 2010 at 8:33am
आचार्य जी, बचपना याद आ गया, हम लोग बहुत सारे खेल खेलते थे जिसमे कोई विशेष सामान की जरूरत नहीं होती थी, और शरीर का अभ्यास भी हो जाया करता था, बहुत ही अच्छी बाल गीत |

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on September 2, 2010 at 7:08pm
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें....
आचार्य जी सादर प्रणाम
बहुत सुन्दर बाल गीत पढ़ने को मिला|
इस प्रकार के शारीरिक परिश्रम के खेल आजकल के बच्चों के जीवन से गायब होते जा रहे हैं| ऐसे में इस खेल की याद आने पर बड़ी सुखद अनुभूति हुई|

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व की ढेरों शुभकामनाएं|

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