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मुक्तिका: चुप रहो... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

चुप रहो...

संजीव 'सलिल'
*
महानगरों में हुआ नीलाम होरी चुप रहो.
गुम हुई कल रात थाने गयी छोरी चुप रहो..

टंग गया सूली पे ईमां मौन है इंसान हर.
बेईमानी ने अकड़ मूंछें मरोड़ी चुप रहो..

टोफियों की चाह में है बाँवरी चौपाल अब.
सिसकती कदमों तले अमिया-निम्बोरी चुप रहो..

सियासत की सड़क काली हो रही मजबूत है.
उखड़ती है डगर सेवा की निगोड़ी चुप रहो..

बचा रखना है अगर किस्सा-ए-बाबा भारती.
खड़कसिंह ले जाये चोरी अगर घोड़ी चुप रहो..

याद बचपन की मुक़द्दस पाल लहनासिंह बनो.
हो न मैली साफ़ चादर 'सलिल' रहे कोरी चुप रहो..

चुन रही सरकार जो सेवक है जिसका तंत्र सब.
'सलिल' जनता का न कोई धनी-धोरी चुप रहो..

***********************************************
-- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

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Comment by sanjiv verma 'salil' on September 11, 2010 at 10:43am
sabhee kadrdanon ka tahe-dil se shukriya.
Comment by guddo dadi on September 6, 2010 at 10:44am
बिटवा भाई
चिरंजीव भवः
चुन चुन कर सटीक प्रहार
पर नेता तो समझें
Comment by Subodh kumar on September 5, 2010 at 4:07pm
Bahut sunder....apne lekhni ke jariye sunder sandesh diya hai aapne..dhanyabaad

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2010 at 10:38am
वाह वाह , बहुत खूब, सरल और व्यंगात्मक भाषा मे लिखी इस रचना के लिये साधुवाद,

माओवाद के पैरो तलक कुचल रहे माँ भारती के लाल,
बैठ लाल कोठी मे खीच रहे सियासत की डोरी चुप रहो,
Comment by आशीष यादव on September 5, 2010 at 9:04am
salil ji pranaam, etna badi baat kahi aapne, in charecters ke madhyam se.

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