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दिल मेरा फिर से सितमगर तलाश करता है।

दिल मेरा फिर से सितमगर तलाश करता है।

आईना जैसे के पत्थर तलाश करता है॥

एक दो क़तरे से ये प्यास बुझ नहीं सकती,

दिल मेरा अब तो समंदर तलाश करता है॥

तेरी धड़कन तेरी हर सांस में छुपा है वो,

आजकल जिसको तू बाहर तलाश करता है॥

जाने किस बात से नाराज़ है मेरा दिलबर,

लेके पत्थर जो मेरा सर तलाश करता है॥

छोडकर मुझको तड़पता हुआ अकेले में,

वो किसी और का बिस्तर तलाश करता है॥

चैन जो दिन का चुराता है नींद रातों की,

दिल उसे ख़्वाबों में अक्सर तलाश करता है॥

अपने हाथों की लकीरों को देखकर मुफ़लिस,

रात दिन अपना मुकद्दर तलाश करता है॥

हरसू मिलती है बहुत भूक बेबसी तंगी,

जब ग़रीबों का कोई घर तलाश करता है॥

खिड़कियाँ खोल के बाहर नहीं देखा “सूरज”

धूप को कमरे के अंदर तलाश करता है॥

                        डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 23, 2012 at 7:30pm

जाने किस बात से नाराज़ है मेरा दिलबर,
लेके पत्थर जो मेरा सर तलाश करता है॥

वाह बाली साहिब वाह, बहुत ही दिलकश ग़ज़ल कही है , दाद कुबूल करें श्रीमान |

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 20, 2012 at 8:11am

आदरणीय बाली जी
               नमस्कार,
                           अपने हाथों की लकीरों को देखकर मुफ़लिस,
                           रात दिन अपना मुकद्दर तलाश करता है॥
बहुत सुन्दर शायरी. कुछ शेर तो दिल को छू लेते हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 17, 2012 at 9:17pm
ek behad khubsurat gazal...
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 17, 2012 at 6:37pm

खिड़कियाँ खोल के बाहर नहीं देखा “सूरज”

धूप को कमरे के अंदर तलाश करता है॥

saare ke saare sher gajab

badhai. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 17, 2012 at 5:54pm

क्या कहा है आपने डा. सूर्या बाली जी !  मतले से मक्ते तक अपने जो ऊँचाई बनाये रखी है, कि दिल खुल कर वाह-वाह करता जा रह है. किस एक शे’र की बात करूँ ?

फिरभी, कुछ शेर को बिना दुहराये नहीं रह पा रहा हूँ. निम्नलिखित शेर भावविभोर कर गये.

एक दो क़तरे से ये प्यास बुझ नहीं सकती,
दिल मेरा अब तो समंदर तलाश करता है॥

तेरी धड़कन तेरी हर सांस में छुपा है वो,
आजकल जिसको तू बाहर तलाश करता है॥

जाने किस बात से नाराज़ है मेरा दिलबर,
लेके पत्थर जो मेरा सर तलाश करता है॥

अपने हाथों की लकीरों को देखकर मुफ़लिस,
रात दिन अपना मुकद्दर तलाश करता है॥

खिड़कियाँ खोल के बाहर नहीं देखा “सूरज”
धूप को कमरे के अंदर तलाश करता है॥

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिये हृदय से बधाइयाँ स्वीकारें, साहब !

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on May 17, 2012 at 11:55am

kya hahun sooraj bhai tareef ke liye alfaz nahin mil rahe hain ek ek sher me waaqai me apne shayri ki hai wah...................................wah dad kubool karein 

Comment by Bhawesh Rajpal on May 17, 2012 at 9:56am

 

बेहद खुबसूरत  !  वाह-वाह ! बहुत - बहुत  बधाई ! 
Comment by Yogi Saraswat on May 17, 2012 at 9:56am

अपने हाथों की लकीरों को देखकर मुफ़लिस,

रात दिन अपना मुकद्दर तलाश करता है॥

हरसू मिलती है बहुत भूक बेबसी तंगी,

जब ग़रीबों का कोई घर तलाश करता है॥

क्या बात है आदरणीय श्री डॉ. बाली जी ! एक एक अल्फाज़ , एक एक अश'आर खूब सूरत !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 16, 2012 at 9:36pm

अपने हाथों की लकीरों को देखकर मुफ़लिस,

रात दिन अपना मुकद्दर तलाश करता है॥

खिड़कियाँ खोल के बाहर नहीं देखा “सूरज”

धूप को कमरे के अंदर तलाश करता है॥    
डा . सूर्या बाली जी बहुत उम्दा ग़ज़ल लिखी है आपने सभी शेर खूबसूरत हैं पर इनदोनो के लिए विशेष दाद कबूल करें 

          

Comment by Nilansh on May 16, 2012 at 8:57pm

खिड़कियाँ खोल के बाहर नहीं देखा “सूरज”

धूप को कमरे के अंदर तलाश करता है॥

bahut sunder ghazal suraj ji

कृपया ध्यान दे...

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