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खून के उफान को ....

टूटते हैं टूटने दो, अब ह्रदय के तार को
छूटते हैं छूटने दो, खून के उफान को
हटो छोडो रास्ता अब, कफ़न सर पर लिये हैं
मौत से अब डर किसे है, मौत से लगते गले हैं
सह चुके अब ना सहेंगे, इस देश के अपमान को
टूटते हैं टूटने दो, अब ह्रदय के तार को
विश्व में उपहास के, कारण बनाये जाते हैं
खद्दरों के भेष में, दीमक हजम कर जाते हैं
इस देश की संपत्ति और, इस देश के सम्मान को
छूटते हैं छूटने दो, खून के उफान को
आम आदमी यहाँ, हाशिए में होता है
जिंदगी कि दौड में, हर राह राह रोता है
कब समझ पायेंगे हम, इन नेताओं के स्वांग को
छूटते हैं छूटने दो खून के उफान को

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Comment by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 11:57am

टूटते हैं टूटने दो, अब ह्रदय के तार को 
छूटते हैं छूटने दो, खून के उफान को 

सुन्दर पंक्तियाँ हैं. 

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 7, 2012 at 10:26pm

 सराहना के लिए विश्वजीत जी धन्यवाद आपको

Comment by Bishwajit yadav on June 3, 2012 at 10:58pm
हटो छोडो रास्ता अब, कफ़न सर पर लिये हैं
मौत से अब डर किसे है, मौत से लगतेगले है

उमा शंकर जी बहुत ही जोश पूर्ण रचना है
जय हो
Comment by UMASHANKER MISHRA on June 3, 2012 at 10:55pm

शुक्रिया महिमा जी

Comment by MAHIMA SHREE on June 3, 2012 at 10:37pm

वाह!!! आदरणीय उमाशंकर जी .. आपने तो जोश भर दिया .. खून में उबाल ला देने वाली ओजपूर्ण कृति के लिए आपको साधुवाद

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 3, 2012 at 7:29pm

 प्रिय संदीप जी आदरणीय  रेखा जी 

हौसला अफजाई के लिये आपको  धन्यवाद 

Comment by Rekha Joshi on June 3, 2012 at 5:48pm

उमाशंकर जी ,

हटो छोडो रास्ता अब, कफ़न सर पर लिये हैं 
मौत से अब डर किसे है, मौत से लगते गले हैं बढ़िया रचना ,बधाई |
Comment by UMASHANKER MISHRA on June 2, 2012 at 7:01pm

आदरणीय प्रिय अलबेला जी ,आदरणीय राजेश कुमारी जी ,

आदरणीय डॉ.सूर्य बाली जी,प्रिय बागी जी

आदरणीय कुशवाहा जी आपका शुक्रगुजार हूँ जो आपने इस

खाकसार को सराहा आपका यह प्यार हमें आसमान में सुराख़ बना देने

को  उत्प्रेरित करता है धन्यवाद ......

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2012 at 6:50pm

इस ओजपूर्ण रचना के लिए साधुवाद आपको साहब
बहुत खूब क्या बात है

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 2, 2012 at 5:20pm

आम आदमी यहाँ, हाशिए में होता है 
जिंदगी कि दौड में, हर राह राह रोता है 
कब समझ पायेंगे हम, इन नेताओं के स्वांग को 

आदरणीय उमाशंकर जी, सादर 

नेता के स्वांग को अपना आदर्श मानेंगे तो स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी. सुन्दर रचना हेतु बधाई.

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