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झींगुर की रुन झुन
रात्रि में घुंघरू का
मुगालता देती हैं
बदरी की चुनरी चंदा पर
घूंघट का आभास कराती है
नीर भरी छलकती गगरी
सागर का छलावा देती हैं
अल्हड शौख किशोरी
के गुनगुनाने का
भ्रम पैदा करते हैं
बारिश की टिप- टिप
संगीत सुधा बरसाती हैं
दामिनी की चमक
श्याम मेघों की गर्जना
विरहणी के ह्रदय की
चीत्कार बन जाती है
अन्तरिक्ष में सजनी साजन
के मिलन की कल्पनाएँ
मिलकर करती हैं जो सृजन
कविताओं का,
उसके रचयिता तुम ही तो हो
ना जाने कौन सी डगर से
चुपचाप चले आते हो
और इन सब कल्पनाओं
को हकीकत के केनवास
पर शब्दों में उकेर जाते हो
कौन हो तुम ?
कोई कवि या सृजनहार ??

****************

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 25, 2012 at 8:13am

राजेशकुमारी जी
             सादर, सामयिक परिद्रश्य के पलों सुन्दरता से रचना में ढालने के लिए बधाई.
 अन्तरिक्ष में सजनी साजन
के मिलन की कल्पनाएँ
मिलकर करती हैं जो सृजन
कविताओं का,
उसके रचयिता तुम ही तो हो.
वाह!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2012 at 11:22am

हार्दिक आभार संदीप जी 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 24, 2012 at 10:29am

वाह वाह कल्पनाओं का आधार है किन्तु एक सजीव चित्र से कम नहीं बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया राजेश कुमारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 24, 2012 at 9:28am

बहुत बहुत हार्दिक आभार सीमा जी शुभकामनाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 23, 2012 at 7:28pm

हार्दिक आभार संजय हबीब जी 

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on July 23, 2012 at 6:20pm

सुन्दर चित्रांकन....

सादर बधाई स्वीकारें आदरणीया राजेश कुमारी जी...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 23, 2012 at 5:09pm

हार्दिक आभार अरुन शर्मा जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 23, 2012 at 3:54pm

सुन्दरता से परिपूर्ण सुन्दर रचना. बधाई स्वीकार करें आदरेया.

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