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नेताजी (कुण्डलिया)
 

नेताजी का हो गया, कवियित्री से ब्याह,

नेतानी कविता लिखें, उनकी निकले आह,

उनकी निकले आह, सुनें जब भी वो दोहा,

लिखना विखना छोड़ पकाना सीखो पोहा,

चलो डार्लिंग किटी, रमी में जीतो बाजी,

समझाते हैं मस्त, नेतानी को नेताजी .......

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Comment by AVINASH S BAGDE on August 6, 2012 at 6:55pm

मजेदार....प्राची जी

Comment by Rekha Joshi on August 6, 2012 at 11:44am

मजेदार कुण्डलिया,बढ़िया व्यंग डी प्राची जी ,मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें  

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 6, 2012 at 9:38am

बहुत सुन्दर प्रयास

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 6, 2012 at 8:44am

प्राची जी

         सादर, बहुत खूब कुंडलिया. ऐसी नेतानी मिले तभी नेताजी को आटे दाल का भाव मालुम होगा. बधाई.

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on August 6, 2012 at 7:50am

वाह वाह॥प्राची जी क्या व्यंग्य मारा है इस कुंडली के माध्यम से .....नेता जी तो कुंडली मर के पीछे ही पड़  जाएँगे.............सुंदर !

बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 5, 2012 at 11:48pm

बढ़िया हास्य कुण्डलिया, वाह !!!!!!!!!!

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 10:43pm

majedaar rachna.......

Comment by Albela Khatri on August 5, 2012 at 10:32pm

waah !

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