चुन चुन के ख्वाब मेरे जलाया दोस्तों
खूँ में उसने आज ये क्या मिलाया दोस्तों
रब से मिलती रही औ घूँट भरती रही
जहर उसने ज्यों प्याले से पिलाया दोस्तों
चाहत घर की रही और मकाँ मिल गया
कैसा किस्मत ने देखो गुल खिलाया दोस्तों
जिस्म अपना रहा औ रूह उसकी मिली
सब कुछ उसकी लगन में है भुलाया दोस्तों
पीर जमती रही औ पर्वत बनता रहा
आंसुओं की तपन ने ना पिघलाया दोस्तों
खुद ही रख दूँ मैं लकड़ी चिता पर मेरी
मेरी जाँ ने मुझे कितना रुलाया दोस्तों
आँखें बंद हो मेरी और मैं पाऊं उसे
जिसकी मुरली ने मुझको है बुलाया दोस्तों
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Comment
चाहत घर की रही और मकाँ मिल गया
कैसा किस्मत ने देखो गुल खिलाया दोस्तों
मकान और घर का फर्क समझती पंक्तियाँ ,
बहुत खूब ....
एक उद्दात कल्पना को मूर्त करती आपकी रचना बेहद पसंद आई खासकर ये पंक्ति
आँखें बंद हो मेरी और मैं पाऊं उसे
जिसकी मुरली ने मुझको है बुलाया दोस्तों
सादर
ह्रदय से आभार शालिनी कौशिक जी
rajesh ji aapki abhivyakti man par gahrai tak asar kar gayi .bahut hi bhavpoorn abhivyakti .
फूल सिंह जी हार्दिक आभार मेरी रचना उसके भाव आपको पसंद आये
राजेश जी नमस्कार..
पीर जमती रही औ पर्वत बनता रहा
आंसुओं की तपन ने ना पिघलाया दोस्तों
खुद ही रख दूँ मैं लकड़ी चिता पर मेरी
मेरी जाँ ने मुझे कितना रुलाया दोस्तों
आँखें बंद हो मेरी और मैं पाऊं उसे
जिसकी मुरली ने मुझको है बुलाया दोस्तों
अति सुंदर पंक्ति......
फूल सिंह
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