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पवन का:- दुख...

लड्डू बने,थालिया बजी
लड़कों के होने पर
घर घर मिठाइयाँ बंटी
घर खुशियों से और
चेहरा अकड़ से भर गया ...

चूल्‍हे चाहे ठंडे रहे
अपना पेट जला
इनका दिल ठंडा किया
फटी जेब की पेंट पहन
सब अरमानो को पूरा किया...

आँसुओं पर पहरा रक्खा
बच्चों की आँखो का रुख़ ना करें
इनकी तो खुश्क हो गयी
अपनी आँखों मे समंदर उतर गया ....

एक की आँखों मे दुख के आँसू
दूसरे बेटे की आँखों मे खून उतर गया
वसीयत इतनी हल्की निकली
बाप ना संभला
और नज़रों से उतर गया ....

ना जाने क्या कमी रह गयी
हमारी शिक्षा और संस्कारों मे
सारी आशाएँ झुर्रियाँ बनी
समय से पहले चेहरा भर गया ....


[मौलिक व अप्रकाशित]

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Comment by वेदिका on March 4, 2013 at 8:30am

बहुत मार्मिक !

शुभकामनायें 

सादर 

Comment by pawan amba on March 4, 2013 at 6:39am

 Saurabh Pandey ji  aapke comnts mere liye prasaad ke samaan hai ....dhanywaad.....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2013 at 12:26am

भाई पवनजी, एक बुजुर्ग के एकाकी दुख को साझा करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.

Comment by pawan amba on March 3, 2013 at 11:44pm

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 3, 2013 at 5:56pm

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

मातापिता किस तरह बेटों के जन्म पर खुशियाँ मनाते हैं, अपनी ख्वाहिशों को रौंद बच्चों के सपने पूरे करते हैं... और अंततः वसीयत किस तरह उन्हें स्वार्थ से भर अजनबी कर देती है...उफ्फ्फ परवरिश में कहाँ कमी रह गयी...यह सवाल और कोइ जवाब नहीं.

इस दर्द को बाखूबी व्यक्त किया है आपने रचना में..

सुन्दर अभिव्यक्ति.

Comment by ram shiromani pathak on March 3, 2013 at 12:17pm

बड़ी  मार्मिक रचना है ! बधाई हो आदरणीय पवन  जी 

Comment by रविकर on March 3, 2013 at 11:44am

आभार आदरणीय-
बढ़िया प्रस्तुति ||

Comment by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 10:00am

सच लिखा आपने। प्रेम से ज्यादा अब वसीयत का मोल रह गया।

कृपया ध्यान दे...

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