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ज़िंदगी की राह के किनारे लगी

ऊंचे दरख्तों की झुकी डालें नंगी हैं.

एक बेचैन सन्नाटे को पछाडकर,

मैं, एक खामोश कोलाहल में,

परेशान भटक रहा हूँ.

शायद अकारण ही!

शायद आगे उस मोड़ पर

कोई तूफ़ान मिल जाए;

शायद उन कँटीली झाड़ियों के पीछे

कोई झुरमुट मिल जाए -

पर आह,

मेरे सपनों के गुलमोहर

इन राहों में बिखरे पड़े हैं.

उन्हें कुचल नहीं सकता, बटोर रहा हूँ -

आँसुओं की नमी में पलकर

वे अभी मुरझाए नहीं हैं.

मेरी झोली भरी है,

आँखों का विश्रामालय भी ठसाठस भरा है,

डर है,

कहीं दिल का सूनापन भी

इन सपनो से न भर जाए.

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 2:14am

वातावरण का निर्माण कर बिम्बों को, आदरणीय शरदिन्दु जी,  आपने अच्छा सजाया है.

मानवीय व्यक्तित्व के असहजपन को सुन्दर अभिव्यक्ति मिली है.

सादर

Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 14, 2013 at 6:57am
आ॰ शारदिंदु जी, अंतस के उद्गारोँ की बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति की है आपने। बधाई स्वीकारें।
Comment by ram shiromani pathak on March 13, 2013 at 9:30pm

आदरणीय शरदिंदु जी:  बहुत.बहुत बधाई---! मन की अधीरता का सुखद चित्रण

 

Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 2:44pm

मेरे सपनों के गुलमोहर

इन राहों में बिखरे पड़े हैं.

उन्हें कुचल नहीं सकता, बटोर रहा हूँ -

बहुत सुन्दर! बधाई स्वीकार करें!
सादर!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2013 at 1:10pm

कहीं दिल का सूनापन भी

इन सपनो से न भर जाए.- अकारण ऐसे सोच से दिल के घाव गहरे हो जाते है | तब मार्मिकी अभिव्यक्ति का जन्म होता है 

और कवी ह्रदय उसे कलम बढ कर पोस्ट करदेता है | सुन्दर रचना अभ्व्यक्ति के लिए बधाई श्री शरदिंदु मुखर्जी जी 

Comment by vijay nikore on March 13, 2013 at 10:56am

आदरणीय शरदिंदु जी:

 

मेरे सपनों के गुलमोहर

इन राहों में बिखरे पड़े हैं.

उन्हें कुचल नहीं सकता, बटोर रहा हूँ -

आँसुओं की नमी में पलकर

वे अभी मुरझाए नहीं हैं.

वाह, वाह, वाह!

बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति है।

 

बधाई।

 

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 13, 2013 at 10:50am

सुंदर सुकोमल भावों से भरी अभिव्यक्ति  के लिए बधाई स्वीकार कजिए आदरणीय 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 13, 2013 at 10:47am

आदरणीय शरदिंदु जी ,
मन की विचित्र कशमकश को अभिव्यक्त करती कोमल मर्मस्पर्शी रचना ...

मेरे सपनों के गुलमोहर

इन राहों में बिखरे पड़े हैं.

उन्हें कुचल नहीं सकता, बटोर रहा हूँ -

आँसुओं की नमी में पलकर

वे अभी मुरझाए नहीं हैं.

मेरी झोली भरी है,

आँखों का विश्रामालय भी ठसाठस भरा है,

डर है,

कहीं दिल का सूनापन भी

इन सपनो से न भर जाए.......................बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

सच ही तो है, ज़िन्दगी के सूने रास्तों पर अपने ही सबसे अजीज सपनों को बटोरते कभी नहीं मुरझाने देते हम, और वही हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को अपने आवरण में समेट लेते हैं 

शुभकामनाएं

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 9:10am

शंशय मन की अधीरता का सुखद चित्रण..! बहुत.बहुत बधाई---!

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