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!!! मासूम सा बच्चा !!!


जाति-पाति और औकात नहीं!
माँ से बिछड़ा-बाप से बिछड़ा
जन-समाज ने पुचकारा नहीं !
दुनिया देख रहा अब बच्चा !
हिन्दू न मुस्लिम बिलकुल सच्चा!
जिसको देखता उसको लुभाता,
लगता जैसे अपना बच्चा !
मंदिर का घंटा ज्यो बजता,
दौड़ चहेक कर आता बच्चा !
मस्जिद की आजान को सुनकर,
रोज फूक डलवाता बच्चा!
हरी शर्ट-केसरिया नेकर,
नंगे पैर ठुमकता बच्चा !
मंदिर का प्रसाद और हलुवा,
गुरूद्वारे में लंगर चखता !
मस्जिद की मिलाद में जाकर,
बूंदी-मीठा शरबत पीता !
बड़ा उमंग-आनंद-उल्लास,
भारत की शान - भारत का बच्चा !
जहाँ किसी ने मारा चाकू
और किसी ने बम को फोड़ा !
मस्जिद के दर सोये बच्चे को
उठा कर फेका मंदिर चौखट पर !
मंदिर पर पड़ा ज्यो डंडा
भाग गया वह गुरूद्वारे पर !
यहाँ चम-चम चमकती तलवारें
काँप गयी रूह बच्चे की !
अब कहाँ भागे, न मिले ठिकाना
यह बच्चे का है बचकाना !
यह कैसा माहौल हो गया,
बच्चा अब बेहोश हो गया !
सुबह हुयी तो भीड़ बढ़ी थी,
खामोश बच्चे की लाश पड़ी थी!
यह कैसा इन्सान है यारो !
पत्थर मारो ! पत्थर मारो !!
के0पी0सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Vindu Babu on April 6, 2013 at 10:34am
मार्मिक भावपूर्ण प्रस्तुति।
सादर बधाई स्वीकारे आदरणीय सत्यम जी।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 6, 2013 at 7:35am

सच्ची बात! हर कोई को भाए बच्चा!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 6, 2013 at 12:02am

मासूम बच्चे पर केन्द्रित सुन्दर अभिव्यक्ति |

Comment by shalini kaushik on April 5, 2013 at 10:50pm
बहुत प्यारी भावात्मक अभिव्यक्ति ह्रदय को छू गयी
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 5, 2013 at 10:27pm

 आदरणीय, प्रिय राम शिरोमणि पाठक जी,  आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार एवं धन्यवाद। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 5, 2013 at 10:24pm

आदरणीय, श्री आशोक कुमार रक्ताले जी,  आपने बिलकुल सही फरमाया, हां ऐसे लोग हैं जिन्हे एकता और सौहार्द नही सुहाता औ वे ही समाज में नफरत फैलाते हैं।  आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार एवं धन्यवाद। सादर,

Comment by ram shiromani pathak on April 5, 2013 at 9:49pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी सुन्दर रचना

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:59pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी सुन्दर रचना. समाज में ऐसे तत्व भी होते हैं जिन्हें आपसी सौहार्द जाने क्यों खटकता है.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 5, 2013 at 8:26pm

 आदरणीय, राजेश कुमार झा जी,  प्रिय मित्र!  आपका प्रश्न बहुत अच्छा है। बात केवल बच्चे की ही नही बल्कि पूरे समाज और मानवता की है। ‘मासूम बच्चा’ एक निरीह प्राणी, निर्दोष जनता और इंसानियत का बिम्ब है। ऐसा मान कर ही मैंने यह रचना की थी। आपका बहुत-बहुत आभार। सादर,

Comment by राजेश 'मृदु' on April 5, 2013 at 6:29pm

मुझे ठीक से समझ नहीं आई रचना,  यह मासूम बच्‍चा किसका प्रतीक है स्‍पष्‍ट करें तो सुविधा होगी

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