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!!! गजल !!!
वज्न-2122, 2122, 2122, 212


तुम जो आये जिन्दगी में, बात सादर हो गयी।
जिन्दगी की सारी सरिता, आज सागर हो गयी।।


आपसी मत भेद भूले, कामना सच हैं नये।
बात रातों की करे तो, चांदनी कर हो गयी।।


हुस्न के जल्वे दिखे है, शाम शबनम की खुशी।
हम सफर जो साथ रहता, आंख कातर हो गयी।।


बन्दगी अब बन्दगी है, रंग - रंगत एक से।
आज फिर राधा-किशन है, बात सुन्दर हो गयी।।


आपकी ही बांसुरी में, गोपियों की लालसा।
राम का दर्शन कराती, मुक्ति सुखकर हो गयी।।


हम नहीं तो क्या सही है, क्या गलत है रास्ता।
आप से ही पूंछता हूं, हाल कमतर हो गयी।।


नफरतों की सोच ‘सत्यम‘,आग को अब रोक दो।
हर कदम अब छांव देखो, धूप बदतर हो गयी।।


के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by seema agrawal on May 13, 2013 at 7:42pm

हार्दिक बधाई  ग़ज़ल के लिए केवल जी 

Comment by Shyam Narain Verma on May 13, 2013 at 5:00pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 13, 2013 at 4:18pm

नफरतों की सोच ‘सत्यम‘,आग को अब रोक दो।
हर कदम अब छांव देखो, धूप बदतर हो गयी।।

बहुत खूब भाव सहित गजल कही है 

सस्नेह बधाई 

Comment by coontee mukerji on May 13, 2013 at 11:34am

तुम जो आये जिन्दगी में, बात सादर हो गयी।
जिन्दगी की सारी सरिता, आज सागर हो गयी।.............कितना सुंदर ...
नफरतों की सोच ‘सत्यम‘,आग को अब रोक दो।
हर कदम अब छांव देखो, धूप बदतर हो गयी।।..............बहुत खूब ....केवल जी  आपकी पिटारी से एक एक  खज़ाना बाहर निकल रहा है  ,पहले लगता था आप भक्ति रस के धनी है  .......लेकिन अब तो लगता है आप काव्य के सभी रसों पर समान अधिकार रखते हैं. अति सुंदर / सादर  / कुंती .

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 13, 2013 at 7:38am

नफरतों की सोच ‘सत्यम‘,आग को अब रोक दो।
हर कदम अब छांव देखो, धूप बदतर हो गयी।।

बस यही सोच तो जगानी है!

Comment by shalini kaushik on May 13, 2013 at 12:20am

 बहुत ही सुन्दर    सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 12, 2013 at 11:54pm

आ0 श्रीराम जी, आपके स्नेह एवं सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by श्रीराम on May 12, 2013 at 7:44pm

सुन्दर गजल ...

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