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साधन में, सुधि में, समाधि ,संवाद में, ढूंढता हूँ संजोये नाम

कागज में, पाती में, दीये की बाती में, खोजा है बेसुध  अविराम,

गैर की निगाहों में, पराजायी बाँहों में, या दिन हो या कोई शाम

जख्मों में, टीसों में,आहों में, शीशों में, हो मेरा शायद गुमनाम  

 

डॉ. ललित

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 454

Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2013 at 12:43pm

वाह वाह क्या बात है | सुन्दर रचना के लिए बधाई डॉ ललित कुमार सिंह जी 

Comment by ajay sharma on June 29, 2013 at 10:50pm

जख्मों में,               pyaar me to aisa hi sambhav hai 

टीसों में,                 fir pyaar ki sudhiya to teesh to dengi hi 

आहों में,                 pyar ho aur meethi meethi sudhiya paas ho to aah to uthegi hi

शीशों में,                 bada mumkin hai har soo wahi chehra 

हो मेरा शायद गुमनाम     har sache pyar ka anzam to huya hi "gumnam"

wah wah wah wah whahhhhhhhhhhhh

Comment by ajay sharma on June 29, 2013 at 10:46pm

wah wah guru ji 

Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2013 at 4:48pm

बहुत ही सुंदर रचना.....................

Comment by Ramkumar Nema on June 29, 2013 at 1:00pm

आदरणीय..बहुत खूब--बधाई कुबूल कीजिऐ 

Comment by रविकर on June 28, 2013 at 10:05am

गजब -
बहुत खूब आदरणीय डाक्टर साहब-
बधाइयाँ

Comment by वेदिका on June 27, 2013 at 9:38pm

सुंदर चतुष्पदी पर बधाई लीजिये!! 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 27, 2013 at 7:04pm
आदरणीय..बहुत खूब पेशकश.."गैर की निगाहों में,पराजायी बाहों में, या दिन हो या कोई शाम..जख्मों में, टीसों में, आहों में, शीशों में, हो मेरा शायद गुमनाम "...आदरणीय दाद कुबूल कीजिऐ

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