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आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

देश में कैसा बदलाव अब हो गया
नंगपन है रईसी ग़ज़ब हो गया  

जबसे इंग्लिश मदरसे खुले, बाप और  
माँ को आँखें दिखाना अदब हो गया

हाथ जोड़े थे जिसने कभी वोट को
आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

अब गधों की फ़तह, मात घोड़ों की हो
दौर दस्तूर कैसा अजब हो गया  

हर्फ के कुछ उजाले लुटा प्यार से   
"दीप" खुर्शीद सा जाने कब हो गया

संदीप पटेल "दीप"

(मौलिक व अप्रकाशित)  

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Comment by वीनस केसरी on July 27, 2013 at 1:05am

जबसे इंग्लिश मदरसे खुले, बाप और  
माँ को आँखें दिखाना अदब हो गया

हाथ जोड़े थे जिसने कभी वोट को
आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

क्या कहने भाई ... बहुत खूब

Comment by राजेश 'मृदु' on July 17, 2013 at 5:32pm

एक बार फिर से जय हो आपकी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 17, 2013 at 4:33pm

बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय दाद क़ुबूल फरमाएँ

Comment by vijay nikore on July 17, 2013 at 1:14pm

आदरणीय संदीप जी:

 

बहुत खूबसूरत गज़ल है। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 17, 2013 at 11:58am
आदरणीय गणेश बागी सर जी सादर प्रणाम , आदरणीय केवल प्रसाद जी प्रणाम
सराहना हेतु बहुत बहुत शुक्रिया
मेरा भी इस तरह शेर कहने का प्रथम प्रयास है इसमें मैं स्वयं भी गुरुजनों और अग्रजों की राय जानना चाहता हूँ
वज्न

२१२ २१२ २१२ २१२
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 17, 2013 at 11:58am

जबसे इंग्लिश मदरसे खुले, बाप और  
माँ को आँखें दिखाना अदब हो गया ------बहुत सुन्दर | वाह ! संदीप भाई हार्दिक बधाई 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 16, 2013 at 9:56pm

आ0 संदीप भाई जी, सुन्दर गजल हुई है।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।   सादर,


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 16, 2013 at 8:28pm

वाह भाई वाह, अच्छी ग़ज़ल कही है, सभी शेर बढ़िया हुए हैं, कृपया वजन लिख दें जिससे तकती समझने में आसानी हो, एक शेर पर मुझे डाउट है ....क्या मिसरा अपूर्ण हो सकता है ? 

जबसे इंग्लिश मदरसे खुले, बाप और  
माँ को आँखें दिखाना अदब हो गया 

दाद कुबूल करें संदीप भाई । 

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