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तुम मेरी बेटी नही 

बल्कि हो बेटा...

इसीलिये मैंने तुम्हें

दूर रक्खा शृंगार मेज से 

दूर रक्खा रसोई से 

दूर रक्खा झाडू-पोंछे से 

दूर रक्खा डर-भय के भाव से 

दूर रक्खा बिना अपराध 

माफ़ी मांगने की आदतों से 

दूर रक्खा दूसरे की आँख से देखने की लत से....

और बार-बार

किसी के भी हुकुम सुन कर 

दौड़ पडने की आदत से भी 

तुम्हे दूर रक्खा...

बेशक तुम बेधड़क जी लोगी 

मर्दों के ज़ालिम संसार में

मुझे यकीन है...

(मौलिक और अप्रकाशित /अप्रसारित) 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 2, 2013 at 12:26am

ग़ज़ब .. . एकदम से ज़मीनी बात

बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 31, 2013 at 3:58pm

अति सुंदर रचना ,आदरणीय अनवर साहब बहुत बहुत बधाई

Comment by vijayashree on August 31, 2013 at 3:41pm

सार्थक अभिव्यक्ति 

हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 31, 2013 at 2:24pm

सार्थक सशक्त अभिव्यक्ति 

हार्दिक बधाई 

Comment by Abhinav Arun on August 30, 2013 at 9:45pm

सुंदर भावपूर्ण रचना आदरणीय बहुत बधाई !!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 30, 2013 at 9:14pm

आ0 अनवर भाई जी, अप्रतिम रचना। हृदयतल से बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर,

Comment by annapurna bajpai on August 30, 2013 at 9:11pm
आदरणीय अनवर जी सुंदर भाव एक बेटी के लिए बधाई आपको ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 30, 2013 at 12:26pm

अनवर भाई, अति  सुन्दर रचना  !!बधाई स्वीकार करें !!

Comment by shubhra sharma on August 30, 2013 at 11:25am

आदरणीय अनवर जी ,आज के परिस्थितियों में लड़कियों के साथ होने वाले अकल्पनीय घटनायों पर तीखा व्यंग , बहुत खूब 

Comment by Shyam Narain Verma on August 30, 2013 at 11:14am
भावनाओं से ओतप्रोत रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.... 

कृपया ध्यान दे...

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