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जैसे टूटता  तटबंध 

और डूबने लगते बसेरे 

बन आती जान पर 

बह जाता, जतन से धरा सब कुछ 

कुछ ऐसा ही होता है 

जब गिरती आस्था की दीवार 

जब टूटती विश्वास की डोर

ज़ख़्मी हो जाता दिल 

छितरा जाते जिस्म के पुर्जे 

ख़त्म हो जाती उम्मीदें 

हमारी आस्था के स्तम्भ 

ओ बेदर्द निष्ठुर छलिया ! 

कभी सोचा तुमने 

कि अब  स्वप्न देखने से भी 

डरने लगा  इंसान 

और स्वप्न ही  तो हैं 

इंसान के ज़िंदा रहने की अलामत....

स्वप्न बिना कैसा जीवन?

(मौलिक अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on September 4, 2013 at 5:58pm

बहुत ही सुंदर गठन के साथ प्रस्‍तुत इस रचना के रचनाकार को सादर नमन

Comment by Meena Pathak on September 4, 2013 at 8:42am

हमारी आस्था के स्तम्भ 

ओ बेदर्द निष्ठुर छलिया ! 

कभी सोचा तुमने 

कि अब  स्वप्न देखने से भी 

डरने लगा  इंसान 

और स्वप्न ही  तो हैं 

इंसान के ज़िंदा रहने की अलामत....

स्वप्न बिना कैसा जीवन?.................... सच स्वप्न बिल जीवन कैसा
सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई

Comment by बृजेश नीरज on September 3, 2013 at 10:52pm

विश्वास पहला पायदान है आस्था के लिए। आस्था को जब चोट पहुंचती है तो एक बारगी बहुत कुछ छिन्न भिन्न हो जाता है। इस बिखराव को बटोरना बहुत कठिन होता है।
इस सुन्दर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई!

Comment by रविकर on September 3, 2013 at 7:56pm

सच है आदरणीय-
स्वप्न बिना कैसा जीवन-
आस्था का छल -

Comment by विजय मिश्र on September 3, 2013 at 5:08pm
अनवर भाई ,सही में बगैर सपने की जिंदगी तो बेबसी और सुबक से बिला कुछ भी नहीं हो सकती .अच्छी रचना , बधाई .
Comment by annapurna bajpai on September 3, 2013 at 4:10pm

बह जाता से धरा सब कुछ.......................  इस पंक्ति को ऐसे लिखें ...... बह जाता धरा से सब कुछ । 

आदरणीय अनवर जी बाकी आपकी रचना सुंदर है , बधाई स्वीकारें । सादर । 

Comment by ram shiromani pathak on September 3, 2013 at 3:14pm

सुन्दर प्रस्तुति। हार्दिक बधाई स्वीकार करें,  सादर

Comment by Shyam Narain Verma on September 3, 2013 at 12:48pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 3, 2013 at 9:08am

आ0 अनवर भाई जी,  सादर प्रणाम! अतिसुन्दर प्रस्तुति। हार्दिक बधाई स्वीकार करें,  सादर,

Comment by aman kumar on September 3, 2013 at 9:02am

इंसान के ज़िंदा रहने की अलामत....

स्वप्न बिना कैसा जीवन

अति सुंदर 

सच दिल तक गयी है !

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