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ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽ
.
झील के पानी में गिर के चाँद मैला हो गया।
स्वाद मीठी नींद का कड़वा-कसैला हो गया॥
.
दो घड़ी भी चैन से मैं साँस ले पाता नहीं,
यूँ तुम्हारी याद का मौसम विषैला हो गया।
.
सभ्यता के औपचारिक आवरण से ऊब कर,
आदमी का आचरण फिर से बनैला हो गया।
.
आँख में मोती नहीं बस वासना की धूल है,
प्यार देखो किस क़दर मैला-कुचैला हो गया।
.
हर किसी को सादगी के नाम से नफ़रत हुई,
कल जिसे कहते थे मजनूँ,आज लैला हो गया।
.
खेत-खलिहानों की लज़्ज़त कंकरीटों में कहाँ,
हर नई पीढ़ी का बचपन बंद थैला हो गया॥
.
-मौलिक एवं अप्रकाशित।
-21.01.2014

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Comment by MAHIMA SHREE on January 26, 2014 at 5:31pm

सभ्यता के औपचारिक आवरण से ऊब कर,
आदमी का आचरण फिर से बनैला हो गया।..

 

खेत-खलिहानों की लज़्ज़त कंकरीटों में कहाँ,
हर नई पीढ़ी का बचपन बंद थैला हो गया.... वाह ... बहुत खूब हार्दिक बधाई आपको रवि प्रकाश जी .

Comment by बसंत नेमा on January 25, 2014 at 11:12am

बहुत सुन्दर रवि जी बेहतरीन गजल के लिये बधाई ...

Comment by Ravi Prakash on January 25, 2014 at 10:01am
आ॰ लक्ष्मण जी, आपको रचना अच्छी लगी, जान कर मन को असीम आनंद प्राप्त हुआ। स्नेह बनाए रखें।
Comment by Ravi Prakash on January 25, 2014 at 9:59am
आ॰ वंदना जी, सराहना तथा सुझाव के लिए हार्दिक धन्यवाद। मैं इस पंक्ति पर और शब्द पर कार्य कर रहा हूँ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 25, 2014 at 6:23am

आदरणीय भाई रवि प्रकाश जी एक बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत बधाई .

सभ्यता के औपचारिक आवरण से ऊब कर,
आदमी का आचरण फिर से बनैला हो गया।

मानव के बदलते आचरण पर खूब चोट की है .

Comment by vandana on January 25, 2014 at 5:58am

सभ्यता के औपचारिक आवरण से ऊब कर,
आदमी का आचरण फिर से बनैला हो गया।

बहुत खूब आदरणीय रवि जी बहुत अच्छी ग़ज़ल 

एक छोटा सा सुझाव है

 खेत-खलिहानों की लज़्ज़त कंकरीटों में कहाँ,
पीढ़ियों का बचपना इक बंद थैला हो गया॥......में बचपना शब्द पर ध्यान दिया जाए तो इसके दो अर्थ हैं एक तो बचपन जिसे बच्चों से जोड़ा जाये तो सही है आपने भी उसी अर्थ में लिया है लेकिन यही शब्द बड़ों के साथ जोड़ें तो बुद्धि की अपरिपक्वता का द्योतक (सूचक ) हो जाता है पीढ़ियों से जुड़कर कहीं दूसरा अर्थ तो संलग्न नहीं हो जाएगा | एक नज़र देखने से मुझे ऐसा लगा |

कृपया अन्यथा मत लीजियेगा ग़ज़ल में आपकी मेहनत और हिंदी का यह स्वरूप  अति प्रशंसनीय है 

कृपया ध्यान दे...

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