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गर्वीला पुष्प (अन्नपूर्णा बाजपेई)

शाख पर लगा 

अलौकिक सौंदर्य पर इतराता 

वसुधा को मुंह चिढ़ाता 

मुसकुराता इठलाता 

मस्त बयार मे कुलांचे भरता 

गर्वीला पुष्प !.......... 

सहसा !!!

कपि अनुकंपा से 

धराशायी हुआ 

कण कण बिखरा 

अस्तित्व ढूँढता 

उसी धरा पर 

भटकता यहाँ से वहाँ 

उसी वसुधा की गोद मे समा जाने को आतुर ... 

बेचारा पुष्प !!! 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on January 27, 2014 at 10:37pm

अब क्या कहूँ? रचना को मिला मुखर अनुमोदन बस बधाई देने को कह रहा है! इस अभिव्यक्ति पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Meena Pathak on January 27, 2014 at 9:34pm

बेहद सुन्दर रचना , बधाई आप को अन्नपूर्णा जी 

Comment by Neeraj Neer on January 27, 2014 at 8:53pm

ओह ! यह कपि अनुकम्पा तो कुछ ज्यादा ही हो गयी :) सुन्दर कविता , जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 27, 2014 at 6:06pm

आदरनीया अन्नपूरणा जी , जीवन की क्षण भंगुरता बताती आपकी सुन्दर रचना के लिये आपको बधाइयाँ ॥

Comment by Neeraj Nishchal on January 27, 2014 at 5:25pm

क्यों बेचारा पुष्प बिखर जाना ही शायद उसका सौभाग्य हो
और वही हो उसकी मंज़िल जिस धरती से उगा उसी धरती में समा गया
बहुत सुन्दर कविता बहुत बहुत बधाई प्रेषित है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 27, 2014 at 12:13pm

आदरणीय अन्नपूर्णा जी सुकोमल भावों से परिपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 27, 2014 at 10:44am

वाह अन्नपूर्णा जी बेहद सुकोमल भावों से लबरेज सुन्दर प्रस्तुति बहुत बहुत बधाई आपको.

Comment by vandana on January 27, 2014 at 5:42am

बहुत सुन्दर भाव आदरणीया अन्नपूर्णा जी 

Comment by annapurna bajpai on January 26, 2014 at 6:02pm

आदरणीय कुशवाहा जी , प्रिय महिमा आपका हार्दिक आभार । 

Comment by MAHIMA SHREE on January 26, 2014 at 5:33pm

सुंदर प्रस्तुती आदरणीया अन्नपूर्णा जी बधाई ..

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