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रंग में भीगी हवा/नवगीत/कल्पना रामानी

रंग में भीगी हवा,

चंचल चतुर इक नार सी,

गाने लगी है लोरियाँ।

 

ऋतु बसंती, पाश फैला कर खड़ी

फागुन प्रिया।

सकल जल-थल, नभचरों को खूब

सम्मोहित किया।

भंग में डूबी फिजा ने, खोल दीं मनुहार की,

भावों भरी बहु बोरियाँ।

 

मद भरे सागर में सारा जग,

लगा है डूबने।

भू पे उतरा गगन, हर ज़र्रा

लगा है झूमने।

बाँचने बैठे छबीले, गीत छंदों की चुटीली,

प्रेम रस की पोथियाँ।

 

दिख रहे कोयल, पपीहे, मोर सब

इक झुंड में।

फूल, भँवरे, तितलियाँ, लहरा रहे

रस कुंड में।

मादलों पर थाप मंगल, हो रहा धरती पे दंगल,

पाँव पायल बाँध लय पर,

पग जमातीं गोरियाँ।

वेब पर अप्रकाशित व मौलिक

मेरे नवगीत संग्रह "हौसलों के पंख "में संग्रहीत

  

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Comment by कल्पना रामानी on March 10, 2014 at 10:58pm

आदरणीय मनोज जी, गीत की सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद  

Comment by Sarita Bhatia on March 10, 2014 at 5:21pm

वाह दीदी खुबसूरत 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 9, 2014 at 7:49pm

आदरणीया कल्पना जी,अति सुन्दर भावपूर्ण वासन्तिक नवगीत के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by Satyanarayan Singh on March 8, 2014 at 2:52pm
अति सुन्दर नवगीत आदरणीया हार्दिक बधाई स्वीकार करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 8, 2014 at 8:16am

इस खूबसूरत रचना के लिये बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 8, 2014 at 8:08am

आपकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति सदा मन मुग्ध कर देती है आदरणीया कल्पना जी, आपको हार्दिक बधाई

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 7, 2014 at 11:37pm

मनोहारी प्रस्तुति..बसंत को भी मुग्ध कर देने वाला..वासन्तिक नवगीत...कोटिशः बधाइयां

कृपया ध्यान दे...

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