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ग़ज़ल - - दर्द मै अपना दबा भी लूँ - ( गिरिराज भंडारी )

2122      2122      2

दिन टपक के सूख जाता है

हाथ में कुछ भी न आता है

 

मै पराया , वो पराया है

कौन किसमें अब समाता है ?

 

ग़म हक़ीक़ी भी मजाज़ी भी

देख किसको कौन भाता है  

 

दर्द मै अपना दबा भी लूँ

ग़म तुम्हारा पर रुलाता है

 

खार चुभते जो रिसा था ख़ूँ

रास्ता वो अब दिखाता है

 

सूर्य तो ख़ुद जल रहा यारों

वो किसी को कब जलाता है

 

ख़्वाबों में आ आ के शिद्दत से

गाँव तो अब भी बुलाता है

 

तू न अब मायूसियाँ ही देख 

देख कोई मुस्कुराता है  

**************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by विजय मिश्र on June 7, 2014 at 5:34pm
"खार चुभते जो रिसा था ख़ूँ
रास्ता वो अब दिखाता है |" -- बेहिसाब जज्ब करने पर इतनी सही बात निकलती है| साधुवाद गिरिराजजी इस अकल्पनीय सच को खूबसूरती से रखने के लिए |
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 7, 2014 at 12:12pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..

दर्द मै अपना दबा भी लूँ

ग़म तुम्हारा पर रुलाता है...क्या बात है 

तू न अब मायूसियाँ ही देख 

खार चुभते जो रिसा था ख़ूँ

रास्ता वो अब दिखाता है..क्या सोचा है 

देख कोई मुस्कुराता है  ....आशावादिता का प्रेरक ..बहुत बढ़िया ..इस ग़ज़ल का हर शेर वाकई शेर है ..इस रचना  के लिए तहे दिल बधाई सादर 

 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 5, 2014 at 9:58pm

क्या कहने वाह वा ..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 5, 2014 at 11:46am

मित्र i मोती  तो बहुत है आपके पास i आप झट-पट माला बना देते है  i एक -एक शेर  सवासेर है भाई, क्या कहूं ? अद्भुत i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 4, 2014 at 11:59pm

ख़्वाबों में आ आ के शिद्दत से

गाँव तो अब भी बुलाता है...............वाह! गजब का शेर हुआ, दिली बधाइयाँ आपको आदरणीय गिरिराज जी

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 6:17pm

ख़्वाबों में आ आ के शिद्दत से
गाँव तो अब भी बुलाता है.…… वाआआआआआआअह क्या बात है हर अशआर की अलग महक ....इस बेहतरीन ग़ज़ल लिए हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज जी

Comment by coontee mukerji on June 4, 2014 at 6:14pm

दिन टपक के सूख जाता है

हाथ में कुछ भी न आता है.....बहुत सुंदर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 4, 2014 at 4:54pm

बहुत बेहतरीन ग़ज़ल ...हर अशआर पर खड़े होकर तालियाँ ....

सूर्य तो ख़ुद जल रहा यारों

वो किसी को कब जलाता है-----ग़ज़ब ग़ज़ब ......

तहे दिल से दाद कबूलें 

 

Comment by Meena Pathak on June 4, 2014 at 12:35pm

क्या बात है ... बहुत बहुत बधाई इस रचना हेतु .. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 4, 2014 at 11:08am

आदरणीय नरेन्द्र भाई , सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

कृपया ध्यान दे...

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