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काम से थककर चूर पत्नी ने कमर पीड़ा से कराहते हुए दर्द भरे स्वर में कहा - ‘हाय रा s sम !’

बिस्तर पर लेटे –लेटे पति ने पत्नी की व्यथा सुनी, बुरा सा मुंह बनाया और जोर से आह भरी – ‘हाय सी s sता !'

 

 

[अप्रकाशित व् मौलिक]

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2014 at 2:51pm

महनीया

आपका ह्रदय से आभार i


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 10, 2014 at 2:25pm

नारी के प्रति पुरुष की असंवेदनशीलता का यह प्रारूप बहुत ही सामान्य है...

आपने दो पंक्तियों में एक क्षण विशेष के साथ ही एक मानसिकता को शब्दों से चित्रांकित किया है 

कम शब्दों में सहजता से अपना असर छोड़ती इस लघुकथा पर हार्दिक बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2014 at 10:43am

आदरणीय सौरभ जी

आलोचना की ग्राह्यता पर मैंने अपने सामान्य  विचार दिए थे i किसी रचना विशेष से आशय नहीं था i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2014 at 10:40am

निलेश जी

आपके शब्दों से बड़ा बल मिला i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2014 at 10:38am

आदरनी शरदिंदु जी

सादर आभार i आपके प्रोत्साहन से बल मिला i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2014 at 10:36am

आदरणीय योगराज जी

आपके विचारो ने संजीवन सा प्रदान किया  i आभार आदरणीय i


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 11:23pm

आदरणीय गोपालनारायनजी,

//मै आलोचना को सदैव सकारात्मक लेता हूँ i मुझे खुशी होती है कि आप जैसे विद्वान मेरी रचना पर इतना समय देकर मार्ग प्रशस्त करते है //

मैंने आपकी इस लघुकथा पर कोई टिप्पणी ही नहीं की है. न कोई कथा सुलभ विचार दिये हैं.

आपकी प्रस्तुति पर आये मंतव्यों पर मैंने अपने विचार अभिव्यक्त किये हैं.

सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 7, 2014 at 11:14pm

मुझे कथा-कहानी की अधिक समझ नहीं है लेकिन जो पढ़ा उसमे चुटकुले या हास्य जैसा तो कुछ भी नहीं है लेकिन ये किसी के कटाक्ष पर कटाक्ष सा लगा ..
कुल मिला कर बात संप्रेषित हुई ...और अभिव्यक्ति का प्रथम और अंतिम उद्देश्य वही है ..
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 7, 2014 at 10:47pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन जी, मैं तो स्तब्ध हो गया आपकी इस लघुकथा को पढ़कर....इसे समझने के लिए जो संवेदनशीलता चाहिए वह तो बहुत से पाठकों में मिल जाएगा, लेकिन इसके मर्म को स्वीकार करने के लिए जिस ईमानदारी और साहस की आवश्यक्ता है......कमी उसी की होती है.....आपने एक सबल वक्तव्य इस सार्थक कथा के माध्यम व्यक्त किया है...यही रचना की सार्थकता है, रचनाकार की सफलता है. अनेक साधुवाद.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 7, 2014 at 9:30pm

लघुकथा एक लम्हा चुराने का नाम है, और वो लम्हा बेहद खूबसूरती से कैमरे की आँख से आ० डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी ने क़ैद किया है. एक पीड़ भरे स्वर के प्रतिउत्तर में ऐसी असंवेदनशील प्रतिक्रिया बहुत कुछ कह गई है. बाकी तो सोच अपनी अपनी - ख्याल अपना अपना। लेकिन मेरे लिए :

(बकौल शायर)
उनको खुद मिले है खुद की जिन्हें तलाश
मुझ को तो बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले।

और मुझे वो झलक मिल गई है, अत:मेरी दिली बधाई स्वीकारें आ० डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी.

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