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एक मैं ही तो गैर था -- डा० विजय शंकर

बाँट दीं खुशियाँ तमाम हमने
कोई दुआएं दे के ले गया
कोई दबाव बना के ले गया
सब अपने ही थे ,कोई गैर नहीं था ||
बाँट दीं खुशियाँ तमाम हमने
कोई आँखें झुका के ले गया
कोई आँखें दिखा के ले गया
सब अपने ही थे कोई गैर नहीं था ||
कोई हंस के मिलता था ,
कोई जल के मिलता था ,
कोई मिल के छलता था ,
कोई छल के मिलता था ,
सब अपने लिए मिलते थे ,
कोई मुझसे नहीं मिलता था ||
लोग , सच कुर्सी पसंद होते हैं
हर मिलने वाला मुझसे नहीं
कुर्सी से मिलता था ||
सब अपने थे कोई गैर नहीं था ||
एक बार भटकता हुआ
कोई गैर आ गया
दो बातें की और दिल पे छा गया ||
उस दिन पता चला मैं क्या था
मेरे पास क्या था
जो मैं बांटता था
सब तो उन्हीं का था ,
सब अपने ही थे , आपस में
एक मैं ही तो उनमें गैर था ॥
तभी तो मेरा नहीं किसी से
कभी भी कोई बैर था ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 27, 2014 at 11:26am
आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी , आपने रचना को समय दिया , आपको रचना अच्छी लगी , जानकर बहुत प्रसन्नता हुई , बधाई के लिए धन्यवाद .
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 27, 2014 at 11:10am
आदरणीय विजय जी ..आपकी रचनाओं के माध्यम से एक नये आयाम की तरफ दृष्टी पैनी होते है सब अपने लिए मिलते थे ,
कोई मुझसे नहीं मिलता था..स्वार्थ से भरी दुनिया में एक रचनाकार के मन में जो भाव उठते हैं उनका बखूबी चित्रण किया है आपने ..इस शानदार शसक्त राचन के लिए तहे दिल बधाई सादर
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 27, 2014 at 12:40am
आदरणीय डॉo प्राची सिंह जी , बहुत बहुत धन्यवाद , आपने एक पारखी दृष्टि से देखा, परखा और कुछ पसंद भी किया. हो सकता है कि अंत आपकी रूचि के अनरूप न बन पाया हो पर वो एक व्यवहारिक सत्य है , लोग भले ही अपनापन दिखाए , हमें अपने काम के प्रति अपना भाव बनाये रखना चाहिए और उसी के प्रति समर्पित रहना चाहिए . वही सही है और जीवन में निर्णय निर्लिप्त होकर ही लेने चाहिए , अंततः वही दीर्घकालिक प्रसन्नता देता है . यही प्रयास किया गया है .वैसे विविधताओं से इंकार भी नहीं किया जा सकता है .
आपने रचना को समय दिया , आपके प्रति सादर आभार . धन्यवाद .
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 27, 2014 at 12:23am
आदरणीय पवन कुमार जी , बहुत बहुत धन्यवाद .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 26, 2014 at 11:29pm

यथार्थ तो कटु ही होता है... व्यवहार में सबके कुछ न कुछ स्वार्थ ही रहते हैं... जो इंसान की उपलब्धियों के इर्द गिर्द जुड़े.. कुछ प्राप्त करने के लोभ या भाव से ही संपर्क साधते हैं. मन अपनों ही द्वारा इस्तेमाल होते जाने के दर्द को महसूसता है... मर्मस्पर्शी कथ्य इस प्रस्तुति का .......... लेकिन अंत नें तार्किकता में कुछ निराश किया.

इस प्रयास पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं आ० डॉ० विजय शंकर जी 

Comment by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 6:04pm

सब अपने ही थे कोई गैर नहीं था ।।
बहुत सुन्दर
सारे रंग व्याप्त हैं.....
खुद के समर्पण के भाव झलक रहे हैं
सादर बधाई............

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 25, 2014 at 9:51pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी ,
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 25, 2014 at 6:10pm
आदरणीय डाक्टर साहेब
बेहतरीन i लाजवाब i
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 25, 2014 at 6:06pm
उम्र बढ़ती है तो वो बातें ही रह जाती हैं जो हम उम्र भर अपने बड़ों से सुनते आते हैं . बस हर चीज़ उसी नज़रिये से दिखने लगती है . आपको विचार प्रस्तुति के लिए धन्यवाद आदरणीय राजेश कुमारी जी .

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 25, 2014 at 5:23pm

आत्म मंथन करते हुए अपने अतीत में झांकना कुछ खोना कुछ पाने का विश्लेषण करना अच्छा लगता है इन्हीं भावों को जीती हुई आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी हार्दिक बधाई आपको आ० डॉ.विजय शंकर जी. 

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