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खुद का भी अहसास लिखो

खुद का भी अहसास लिखो!
एक मुकम्मल प्यास लिखो!!

उससे इतनी दूरी क्यों !
उसको खुद के पास लिखो !!

खाली गर बैठे हो तुम!
खुद का ही इतिहास लिखो !!

 गलती उसकी बतलाना !
खुद का भी उपहास लिखो!!

हे ईश्वर ऊब गया हूँ!
मेरा भी अवकाश लिखो!!
***************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित
 

Views: 930

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on August 30, 2014 at 8:39pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया सविता जी 

Comment by MAHIMA SHREE on August 28, 2014 at 9:14pm

वाह  बहुत खूब .. शानदार ग़ज़ल कही रामशिरोमणि जी बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 27, 2014 at 2:59pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी ..आपकी यह ग़ज़ल बेहद पसंद आयी बस आखरी अशार गुनगुनाने में थोड़ी रुकावट महसूस हुई ..इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 26, 2014 at 11:31pm

प्रिय राम शिरोमणि पाठक जी 

मुझे आपकी ये ग़ज़ल बहुत पसंद आयी... 

दिली मुबारकबाद इस सुन्दर ग़ज़ल पर 

Comment by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 6:06pm

आदरणीय भईया राम शिरोमणि जी....
आपने लिखने के बहुत अच्छे अच्छे सुझाव दिये हैं........
सुन्दर रचना सादर बधाई

Comment by Sarita Bhatia on August 25, 2014 at 1:50pm

क्या बात !! वाह 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 25, 2014 at 11:05am

आदरणीय भाई राम शिरोमणि जी , बहुत सुंदर गजल हुई है लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें।

Comment by कल्पना रामानी on August 24, 2014 at 10:46pm

गजल बहुत सुंदर कही है आदरणीय राम शिरोमणि जी, बहुत बहुत बधाई आपको।

Comment by savitamishra on August 24, 2014 at 10:41pm

बहुत बढ़िया


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 24, 2014 at 1:02pm

भाई शिज्जू जी, अवकाश का उक्त शेर में लाक्षणिक प्रयोग हुआ है.

कृपया ध्यान दे...

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