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लिखो किसी भी शिल्प में, मोटा लिखो महीन । 
कलम चले पर इस  तरह, पीड़ित  करे यकीन ॥01॥  
  
रिश्तों   के   पर्वत  किए,  हरियाली   से  हीन । 
चाह   रहा   शीतल  हवा,  कैसा   मूरख  दीन ॥02॥  
 
बंधन   तो  था  जनम  का, हुआ बीच में भंग । 
कैसे   चलता   दूर   तक, धुंध - धूप का  संग ॥03॥   
 
पश्चिम  की आँधी  चली,  भूले  पनघट  गीत । 
गमलों में तरु सज रहे, बट - पीपल  भयभीत ॥04॥
 
- शून्य आकांक्षी   
अप्रकाशित एवं मौलिक 

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Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 15, 2017 at 12:18am

आदरणीय Shyam Narain Verma जी,
आपको दोहे पसंद आए | मेरा लेखन सफल हुआ | प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद जी | 

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on September 24, 2016 at 12:31am

 डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,
आपको दोहे अच्छे लगे, यह जानकर प्रसन्नता हुई । आपका हार्दिक धन्यवाद । 

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on October 9, 2014 at 8:23am
आपकी टिप्पणी से मन मुदित हुआ । सुखद अनुभूति हुई । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद । 
Comment by Santlal Karun on September 27, 2014 at 8:38pm

आदरणीय उपाध्याय जी,

आप ने अर्थपूर्ण दोहे प्रस्तुत किए हैं, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ---

"पश्चिम  की आँधी  चली,  भूले  पनघट  गीत । 
गमलों में तरु सज रहे, बट - पीपल  भयभीत ॥"

Comment by vijay nikore on September 27, 2014 at 1:40pm

दोहे अच्छे लगे। बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 27, 2014 at 7:48am

आदरणीय उपाध्याय जी बहुत अच्छी दोहावली है बहुत बहुत बधाई

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 26, 2014 at 2:21pm
पश्चिम  की आँधी  चली,  भूले  पनघट  गीत । 
गमलों में तरु सज रहे, बट - पीपल  भयभीत ॥
 बहुत सुंदर बधाई
Comment by Shyam Narain Verma on September 26, 2014 at 10:13am

बहुत सुंदर दोहें हार्दिक बधाई स्वीकार करें .....................

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on September 26, 2014 at 8:10am
आपके स्वागत से मैं बहुत अभिभूत हूँ  rajesh kumari जी ........ आपके द्वारा दोहों पर की गयी प्रशंसात्मक टिप्पणी मेरे लिए बहुत महत्व रखती है । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 25, 2014 at 5:18pm

सर्वप्रथम तो ओबिओ पर आपका हार्दिक स्वागत है आ० सी एम् उपाध्याय जी बहुत अच्छा लगा आपको यहाँ देखकर |

दोहों के लिए तो वाह ,,,वाह....बस  वाह  ....ढेरों बधाई आपको इन शानदार सार्थक दोहों के लिए  

बंधन   तो  था  जनम  का, हुआ बीच में भंग । 
कैसे   चलता   दूर   तक, धुंध - धूप का  संग ॥03॥   
 इस दोहे के लिए तो विशेष बधाई 

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