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जिंदगी सर को झुका कर रह गई...

हर क़दम पर मात खाकर रह गई,

जिंदगी सर को झुका कर रह गई.

देख लो पहचान मेरी हो जुदा,

एक खुदसर में समाकर रह गई.

होगी मलिका सल्तनत की वो मगर,

मेरी खातिर कसमसा कर रह गई.

रूह मुझसे जाँ छुड़ाने के लिए,

हर दफा बस छटपटा कर रह गई.

सोजे दिल पानी से भी ना बुझ सके,

आंख भी आंसू बहा कर रह गई.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by इमरान खान on December 14, 2014 at 5:24pm

आदरणीय योगराज जी आपकी बधाई और निरंतर छत्र-छाया के लिए धन्यवाद....

देख लो पहचान मेरी हो जुदा,
एक खुदसर में समाकर रह गई.

इस शेर में मैं कहना चाह रहा हूँ कि मैंने खुद को किसी के लिए इतना समायोजित किया कि मैं मैं नहीं रहा, पहचान तक खो गई, और वो पहचान एक खुदसर में समा गई.

इस शेर पर भी नज़र डालियेगा...
/देखकर लोग मुझे नाम तेरा लेते हैं, इस पे मैं खुश हूँ, इश्क का ये अंजाम तो है/

अगर मफहूम अब भी पूरी तरह स्पष्ट न हो रहा हो, तो इस्लाह की दरकार ....

Comment by इमरान खान on December 14, 2014 at 5:14pm

आपका हार्दिक धन्यवाद राजेश कुमारी जी, अजय शर्मा जी, मीना पाठक जी. गिरिराज भंडारी जी आपका भी बेहद शुक्रिया.

Comment by इमरान खान on December 14, 2014 at 5:12pm

आदरणीय बागी जी सौभाग्य की बात है कि मेरी ग़ज़लगोई पसंद आई. मुझ ओबीओ के उत्पाद को ओबीओ के सरपरस्तों की सराहना मिल रही है, मेरी इससे बड़ी कोई और उपलब्धि हो ही नहीं सकती. मैं दिल की गहराइयों से शुक्रगुज़ार हूँ आपका.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 10, 2014 at 11:12am

हर क़दम पर मात खाकर रह गई,

जिंदगी सर को झुका कर रह गई.  --- बहुत खूब , आदरणीय इमरान भाई गज़ल के लिये और इस शे र के लिये बधाई !

Comment by Meena Pathak on December 9, 2014 at 8:07pm

बहुत खूब 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 12:12pm

ग़ज़ल बढ़िया हुई है भाई इमरान खान जी, जिस हेतु बधाई भी पेश है। लेकिन दूसरा शेअर ऊपर से निकल गया भाई।

Comment by इमरान खान on December 6, 2014 at 4:54pm

हार्दिक धन्यवाद .... डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव, narendrasinh chauhan एवं Rahul Dangi जी.

Comment by इमरान खान on December 6, 2014 at 4:22pm

बहुत शुक्रिया हरि प्रकाश दूबे जी...

Comment by इमरान खान on December 6, 2014 at 4:21pm

धन्यवाद सोमेश कुमार जी ... दीवारों की परवाह करते नहीं हैं, जो हद से गुज़रते हैं डरते नहीं हैं....

Comment by ajay sharma on December 5, 2014 at 9:59pm

रूह मुझसे जाँ छुड़ाने के लिए,

हर दफा बस छटपटा कर रह गई.  behatreen sher ..............

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