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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२  २१२२ २१२

तुमने पुरखों की हवेली बेच दी

शान दुःख सुख की सहेली बेच दी

भूख दौलत की मिटाने के लिए

मौत को दुल्हन नवेली बेच दी

जिस्म के बाजार ऊंचे दाम थे

गाँव की राधा चमेली बेच दी

बस्ता बचपन और कागज़ छीनकर

तुमने बच्चों  की हथेली बेच दी

गाँव में दिखने लगा बाज़ार पन

प्यार सी वो गुड की भेली बेच दी

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

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Comment by Anurag Prateek on December 25, 2014 at 9:07pm

जबसे  पुरखों की हवेली बेच दी

तुमने सुख-दुःख  की सहेली बेच दी

भूख दौलत की मिटाने के लिए

मौत को दुल्हन नवेली बेच दी-- मौत कुछ खरीदती नहीं ,

जिस्म के बाजार ऊंचे दाम थे--(मिसरा अधूरा है ) जिस्म के बाजार की कीमत बहुत 

गाँव की राधा चमेली बेच दी

बस्ता बचपन और कागज़ छीनकर

तुमने बच्चों  की हथेली बेच दी--- अच्छा है 

गाँव में दिखने लगा बाज़ार पन

प्यार सी वो गुड की भेली बेच दी- सामान्य 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on December 24, 2014 at 9:02pm

बहुत ही सुन्दर! एक से बढ़कर एक पंक्तियाँ और गहरे भाव!

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 24, 2014 at 7:47am

धन्यवाद दोस्तो

Comment by harivallabh sharma on December 23, 2014 at 11:34pm

लाजबाब  गजल आदरणीय Gumnam Pithoragarhi साहब..बधाई..आपको.

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 23, 2014 at 10:49pm
बहुत सुन्दर वाह

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 23, 2014 at 10:32pm

अच्छी ग़ज़ल, दाद कुबूल करें .

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 23, 2014 at 6:21pm

शुक्रिया दोस्तो आप लोगो की सराहना और सलाह हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते है ,,,, शिज्जु "शकूर जी शुक्रिया

Comment by Hari Prakash Dubey on December 23, 2014 at 5:59pm

गाँव में दिखने लगा बाज़ार पन

प्यार सी वो गुड की भेली बेच दी

आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी . सुन्दर प्रस्तुति .हार्दिक बधाई !

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 23, 2014 at 5:40pm

तुमने पुरखों की हवेली बेच दी

शान दुःख सुख की सहेली बेच दी..... आपकी टीसभरी भावना से लबरेज इस रचना के लिये शब्द नहीं....... अतिसुंदर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 23, 2014 at 3:51pm

गुम् नाम जी

सुन्दर गजल i

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