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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२२१

ये अखबार

सच बीमार

कैसा धर्म

गो,तलवार

सच की राह

है दुश्वार

मरघट देगा

रिश्तेदार

आ ऐ मौत

कर उद्धार

जग गुमनाम

किसका यार

मौलिक व अप्रकाशित

आपकी समालोचना की प्रतीक्षा है

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 13, 2015 at 11:19am

आ0 भाई गुमनाम जी ,  छोटी बहर की इस गज़ल का ये रूप और इस में नए विचार - बहुत बहुत बधाई l

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 12, 2015 at 7:50pm

शुक्रिया दोस्तो आप का साथ शक्ति देता है ...............वाह मिथिलेश जी वाह आपका अंदाज़ भा गया शुक्रिया

Comment by Hari Prakash Dubey on January 12, 2015 at 5:08pm

 ये अखबार

सच बीमार.... सुन्दर रचना आदरणीय गुमनाम भाई , हार्दिक बधाई ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 12, 2015 at 3:30pm

बहुत बढ़िया गुमनाम जी  i

Comment by Madan Mohan saxena on January 12, 2015 at 3:15pm

बेहद उम्दा ग़ज़ल ,वाह वाह ! क्या बात है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 12, 2015 at 10:52am

वाह वाह ! क्या बात है गुमनाम भाई , एक रुक्नी गज़ल खूब कही है ! हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 12, 2015 at 8:33am

जय गुमनाम 

क्या अशआर !

उम्दा ग़ज़ल 

कायल यार.

खूब कमाल 

अब की बार 

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 11, 2015 at 10:44pm

शुक्रिया दोस्तो आपने प्रयास को सराहा ............सोमेश भाई जी विस्तार से समीक्षा के लिए आभार,,,,,,,

Comment by umesh katara on January 11, 2015 at 6:17pm

वाह वाह

Comment by मोहन बेगोवाल on January 11, 2015 at 6:11pm

 छोटी बहर की इस गज़ल का ये रूप और इस में नए विचार - बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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