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ग़ज़ल: मर्ज़ अपने हैं सभी...

मर्ज़ अपने हैं सभी कोई न बेगाना
मेरे घर का एक कोना है दवाखाना

इक नशा सा है मगर साकी न पैमाना
ज़ख़्म अपने पास हैं और दूर मैखाना

किस बीमारी का पता क्या है, वतन क्या है
पूछना कुछ हो तो मेरे घर पे आ जाना

आह भी है, ऊह भी है, शाम है ग़मगीन
शम्अ जलती दर्द की, मैं मस्त परवाना

कोई काँटा, कोई पत्थर, कोई ख़ंजर है
दर्ददाताओं से ही अपना है याराना

इक ग़ज़ल आयी ठिठुरती, कह गयी मुझसे
जम न जाना, जनवरी में ठंड है, माना ।

धूप धरती से किसी ने अपहरण कर दी
बादलों के पार भी तो हो कोई थाना

उन बहारों के न कोई ख़्वाब थे फिर भी
बन गयी कल की हक़ीक़त आज अफ़साना

कर दिये थे बन्द, दिल के खिड़की दरवाज़े
फिर भी अंदर सज गया माहौल ग़ज़लाना

नृत्य करती हैं हवाएँ बाँधकर घुँघरू
बज रही है ताल धिन् धिन् ताना धिन् ताना

ये महल, दौलत तुम्हें ही हो मुबारक यार
अब मिरी आज़ादी पर भी जी न ललचाना
(मौलिक व अप्रकाशित)
-कृष्णसिंह पेला

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Comment by Krishnasingh Pela on January 20, 2015 at 9:58pm
हार्दिक धन्यवाद आ. गुमनाम पिथौराढी जी ।
Comment by Krishnasingh Pela on January 20, 2015 at 9:57pm
आपकी बातें ही मुझे मस्त कर गयीं आदरणीय राहुल साहब । आपने वही शेर कोड किया है जो मुझे भी बहुत भाता है । आपका थाने से होना भी एक सुखद संयोग है । हार्दिक धन्यवाद !
Comment by Krishnasingh Pela on January 20, 2015 at 9:41pm
जी, आदरणीय मिथिलेश जी । आपने सराहा तो मेरा प्रयास सार्थक हुआ । धन्यवाद ।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 9:39pm

आदरणीय कृष्ण सिंह जी इस  सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें !

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 20, 2015 at 9:23pm

वाह सर खूब ग़ज़ल हुई है बधाई

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 20, 2015 at 9:22pm
आदरणीय कृष्ण सिंह जी बहुत बहुत बहुत लाजवाब झूम रहा हूं मैं इस गजल को गुनगुना कर बार बार गुनगुनाने का मन कर रहा ! नमन आपकी लेखनी को क्या रसदार गजल कही है! वाह वाह वाह! हक शे'र दिलकश!
और इस ने तो जान निकाल ली!
धूप धरती से किसी ने अपहरण कर दी
बादलों के पार भी तो हो कोई थाना ! सादर!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2015 at 7:12pm
आदरणीय कृष्ण सिंह जी बह्र को खूब निभाया है
हार्दिक बधाई
फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फा
Comment by Krishnasingh Pela on January 20, 2015 at 2:37pm

अादरणीय  मिथिलेश वामनकर जी इस ग़ज़ल काे निम्नानुसार वाचन करें : 

2122 2122 2122 2  यानि 

लाललाला लाललाला लाललाला ला

धन्यवाद । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2015 at 11:40am
आदरणीय कृष्ण सिंह जी ग़ज़ल की बह्र- वज़्न नहीं समझ पा रहा हूँ कृपया वज़्न लिख दे। सादर।

कृपया ध्यान दे...

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