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ऋतु बसंत का आगमन,शीतल बहे सुगंध,

खलिहानों से आ रही, पीली  पीली  गंध |

 

जाडा जाते कह रहा, आते देख बसंत,

मधुर तान यूँ दे रही, बनकर कोयल संत |

 

वन उपवन सुरभित हुए, वृक्ष धरे श्रृंगार

माँ वसुधा का मनिएँ, बहुत बड़ा आभार |

 

कलरव करते मौर अब, देखें उठकर भोर,

अद्भुत कुदरत की छटा, करती ह्रदय विभोर |

 

फूलों पर मंडरा रहे, भँवरे गुन गुन गान

मतवाला मौसम सुने, कुहू कुहू की तान |

 

पुष्प जड़ी चुनरियाँ सी, वसुधा ने ली ओढ़

नयें वस्त्र में डालियाँ, दिख जाती हर मोड़ |

 

गुनगुन करते गा रहे,भँवरों का अब दाँव,

पीत रंग में सज रहे,  साजन से हर गाँव |

 

कलियों की मुस्कान से, खिला प्यार का रंग,

मन मयूर अब नाचता, भर कर खूब उमंग |

 

काम काज सब छोड़कर, लौटा उलटे पाँव

बासंती मौसम हुआ,  देख हमारे गाँव |

 

गोद भराई हो रही, कर न सके सब चूक,

महक उठें उपवन सभी, कुहू कुहू की कूक |

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 5, 2015 at 10:11am

हार्दिक  आभार आपका श्री मोहन बेगोवाल जी और श्री विश्व राज सिंह राठौर जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 5, 2015 at 10:09am

आपका बहुत बहुत आभार श्री जितेन्द्र पस्तारिया जी और श्री गुमनाम पिथोरागढ़ी जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 5, 2015 at 9:53am

बसंत ऋतू पर दोहे सराहने के लिए आपका  हार्दिक  आभार  श्री गिरिराज भंडारी जी 

Comment by ajay sharma on February 4, 2015 at 11:31pm

बसंत ऋतु का आगमन,शीतल बहे सुगंध,

खलिहानों से आ रही, पीली  पीली  गंध |..............bahut khoob kaha hai ....sir yadi .....ऋतु बसंत का आगमन,शीतल बहे सुगंध, kaha jaye to geyata zyada rahegi ....

पुष्प जड़ी चुनरियाँ सी, वसुधा ने ली ओढ़

नयें वस्त्र में डालियाँ, दिख जाती हर मोड़ |    is dohe me bhi geyata .....me kuch .......yadi uchit samjhe to ik baar delh le.kshma chhta hoo... 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 4, 2015 at 11:09pm
खिला प्यार का रंग , सभी दोहे बहुत अच्छे हैं , बधाई आदरणीय , लक्षमण लडीवाला जी, सादर।
Comment by Samar kabeer on February 4, 2015 at 10:56pm
जनाब लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी, आदाब,दोहे बहुत ही सुन्दर हैं,लेकिन पहले दोहे की दूसरी पंक्ति "खलिहानों से आ रही पीली पीली गंध"समझ में नहीं आ रही,क्या गंध का रंग भी होता है?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 4, 2015 at 9:29pm

आदरणीय  लक्ष्मण रामानुज लडीवाला सर बहुत ही खूबसूरत मौसमी दोहे है, मन मोह लिया आपको इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई

Comment by मोहन बेगोवाल on February 4, 2015 at 6:21pm

  बहुत खुबसूरत दोहे दिल को छू गए -बहुत बहुत बधाई 

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 4, 2015 at 5:22pm
वाह बहुत खूबसूरत दोहे वाह मन मोह लिया बधाई
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 4, 2015 at 5:13pm

बसंत की अगुआई पर, सुंदर सादगीपूर्ण दोहे प्रस्तुत किये आपने आदरणीय लक्ष्मण जी. बहुत-बहुत बधाई

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