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गाँव को तहजीब में यारो नगर मत कीजिए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212

******************************
कोशिशें  पुरखों  की  यारों बेअसर मत कीजिए
नफरतों को फिर दिलों का यूँ सदर मत कीजिए

******
मिट गये  ये तो  नरक  सी जिंदगी हो जाएगी
प्यार  को  सौहार्द  को यूँ दरबदर मत कीजिए

******
कर रहे हो  कत्ल  काफिर बोलकर मासूम तक
नाम  लेकर  धर्म का  ऐसा कहर  मत कीजिए

******
वो  शहीदी  कैसे  जिनसे  है  फसादों   की  फसल
उनको ये इतिहास में लिख के अमर मत कीजिए

*******
दुश्मनी  होती  है पल में  दोस्ती  को  इक दसक
दोस्तों से  यूँ  सियासत  को  समर मत कीजिए

*******
कुछ तो अपनापन  बचा है नीम तुलसी आम में
गाँव  को  तहजीब  में  यारो  नगर मत कीजिए

*******
चाहिए  रफ्तार  लेकिन  जिंदगी  घोड़ा  नहीं
बेमियादी  दौड़  से  लय  बेबहर मत कीजिए

************************
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2015 at 1:41pm

आ0 भाई हरिप्रकाश जी , गजल का अनुमोदन कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by khursheed khairadi on February 7, 2015 at 11:01am

कर रहे हो  कत्ल  काफिर बोलकर मासूम तक
नाम  लेकर  धर्म का  ऐसा कहर  मत कीजिए

आदरणीय लक्ष्मण साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 7, 2015 at 9:22am

आदरणीय लक्ष्मण भाई , हर शे र लाजवाब  हुये हैं , आपको दिली बधाइयाँ । बस एक बात -  कहर , बेबहर  , के वास्तविक रूप इस गज़ल के काफिया नहीं बन पायेंगे ( केवल जानकारी के लिये ) ।  

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 6, 2015 at 11:20pm

आदरणीय लक्ष्मण जी .इस बेहतरीन ग़ज़ल पर मेरी तरफ से ढेरों बधाई स्वीकार करें 

मिट गये  ये तो  नरक  सी जिंदगी हो जाएगी

प्यार  को  सौहार्द  को यूँ दरबदर मत कीजिए................सामयिक सन्देश आज की सबसे बड़ी जरूरत 

******
कर रहे हो  कत्ल  काफिर बोलकर मासूम तक
नाम  लेकर  धर्म का  ऐसा कहर  मत कीजिए..........चिंतन की बात 

******
वो  शहीदी  कैसे  जिनसे  है  फसादों   की  फसल
उनको ये इतिहास में लिख के अमर मत कीजिए.....अच्छा मशविरा 

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दुश्मनी  होती  है पल में  दोस्ती  को  इक दसक
दोस्तों से  यूँ  सियासत  को  समर मत कीजिए...........बेहतरीन 

*******
कुछ तो अपनापन  बचा है नीम तुलसी आम में
गाँव  को  तहजीब  में  यारो  नगर मत कीजिए.............ये बात तो दिल को छू गयी 

*******
चाहिए  रफ्तार  लेकिन  जिंदगी  घोड़ा  नहीं
बेमियादी  दौड़  से  लय  बेबहर मत कीजिए..बिलकुल सहे  इस रचना पर पुनः आपको ढेरों बधाई सादर 

Comment by somesh kumar on February 6, 2015 at 10:24am

दुश्मनी  होती  है पल में  दोस्ती  को  इक दसक
दोस्तों से  यूँ  सियासत  को  समर मत कीजिए

पूरी गज़ल बेहतरीन शे'रों से मुक्कमल हुई है |और दिल्ली के चुनावी माहौल और अपने घर-आसपास के माहौल पर ये शे'र खूब पसंद आया |

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 6, 2015 at 6:44am
आदरणीय लक्षमण धामी जी , बहुत कुछ समेटती है यह रचना , समसामयिक भी, यथार्थवादी भी , सार्थक तो है ही।
बधाइयां , बहुत बहुत, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2015 at 3:15am

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल हुई है दिली दाद कुबूल करे ... ख़ास तौर से ये दो अशआर 

कुछ तो अपनापन  बचा है नीम तुलसी आम में
गाँव  को  तहजीब  में  यारो  नगर मत कीजिए...... बहुत ही उम्दा वाह 

चाहिए  रफ्तार  लेकिन  जिंदगी  घोड़ा  नहीं
बेमियादी  दौड़  से  लय  बेबहर मत कीजिए--बहुत खूब कहा है ... बेहतरीन शेर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 5, 2015 at 9:02pm

कुछ तो अपनापन  बचा है नीम तुलसी आम में
गाँव  को  तहजीब  में  यारो  नगर मत कीजिए--बहुत सुन्दर 

चाहिए  रफ्तार  लेकिन  जिंदगी  घोड़ा  नहीं
बेमियादी  दौड़  से  लय  बेबहर मत कीजिए--बहुत खूब 

बहुत बहुत बधाई आपको लक्ष्मण भैया 

Comment by Chhaya Shukla on February 5, 2015 at 7:39pm

आदरणीय क्या बात कही है आपने एक एक शेर मन की गहराई में उतरते हुए
ढेरों बधाई कबूल फरमाएं |
सादर नमन !
प्रिय शेर -
चाहिए  रफ्तार  लेकिन  जिंदगी  घोड़ा  नहीं
बेमियादी  दौड़  से  लय  बेबहर मत कीजिए

Comment by ram shiromani pathak on February 5, 2015 at 7:21pm
वाह भाई दिल खुश कर दिया आपने।।हार्दिक बधाई आपकोकर रहे हो कत्ल काफिर बोलकर मासूम तक
नाम लेकर धर्म का ऐसा कहर मत कीजिए।।इस शेर के लिए बहुत बहुत बधाई

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