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(अविजित राय की हत्या जैसे कायरतापूर्ण कृत्य ने दहला दिया...दुनिया भर के अल्पसंख्यकों को समर्पित कविता)
चेहरे-मोहरे
चाल-ढाल से जब 
पहचाना न जा सका 
तब पूछने लगा वो नाम 
और मैं बचना चाह रहा बताने से नाम 
फिर यूँ ही टालने के लिए 
लिया ऐसा नाम 
जो मिलता-जुलता हो उससे कुछ-कुछ 
जिसे कहने से
बचा जा सके पहचान लिए जाने से

लेकिन ये क्या 
अब पूछा जा रहा 
गोत्र/कुल/गाँव-घर 
यानी कि झूठ के पाँव नही थे 
लडखडा कर गिर पडा झूठ 
और मैंने झट सफाई दी 
ये मेरा पुकारू नाम है भाई 
जिससे दोस्त-अकारिब के बीच मुझे जाना जाता है 
जबकि मेरा नाम है इंसान 
उसने मुझे घूर कर देखा
ये भी कोई नाम हुआ...

उसकी आँखों के एक्स-किरणों ने 
मुझे भीतर तक भेद डाला 
मैं घिर चुका था 
अब वो अकेला न था
उसके साथ हुजूम था 
उनके दिलों में नफरत थी 
उनकी निगाहों में शो'ले थे 
उनकी बातों में गालियाँ ही तो थीं 
जिनके बीच मैं फंस चुका था 
बच निकलने की कोई न थी आस 
और मैं सोच रहा था 
इससे बेहतर था क्या सच बोलना 
ऐसे कब तक छुपाई जायेगी 
अपनी पहचान...

(मौलिक अप्रकाशित) 

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Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2015 at 11:05pm

बहुत खूब, आदरणीय अनवर सोहैल भाई !

Comment by anwar suhail on March 11, 2015 at 7:50pm

शुक्रगुज़ार हूँ आप सभी का...सादर 

Comment by maharshi tripathi on March 9, 2015 at 11:01pm

 आजकल सही पहचान बताने पर यही होता है ,,,,, कविता पर आपको बधाई आ.अनवर शुशील जी |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 9, 2015 at 7:04pm

युग बदल गए!लोग नही बदले!सार्थक प्रस्तुति ,अभिनन्दन आदरणीय!!

Comment by Hari Prakash Dubey on March 8, 2015 at 12:14pm

आदरणीय अनवर  सुहेल जी, नाम और फिर उपनाम , समस्या सदियों से जीवित है ,बहुत सार्थक प्रस्तुति ,बधाई सर !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 8, 2015 at 11:43am

बहुत उम्दा, सर. मन को झकझोर देती रचना. बधाई आदरणीय ,अनवर साहब.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 7, 2015 at 9:11pm

मित्र अनवर  सुहेल जी

बहुत सुन्दर भावपूर्ण कथन i

Comment by भुवन निस्तेज on March 7, 2015 at 2:19pm
वर्तमान समाज का छिद्रान्वेषण...!
Comment by somesh kumar on March 7, 2015 at 9:57am

इससे बेहतर था क्या सच बोलना 
ऐसे कब तक छुपाई जायेगी 
अपनी पहचान...

सही बात की आप ने ,नाम और उसके बाद का उपनाम है  जिसमें इन्सान की पहचान गायब है |

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