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ग़ज़ल ------------------गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२ २१२२  २१२

दर ब दर भटके बिचारी ज़िन्दगी
मौत से भी देखो हारी ज़िन्दगी

आसुओं में रही यूँ वो तर ब तर
इसलिए तो लगती खरी ज़िन्दगी

मांगती ही रहती है साँसे सदा
हर बशर की है भिखारी ज़िन्दगी

ख़त्म गर्भों में हुई जो धडकनें
अब कहाँ है वो कुंवारी ज़िन्दगी

बोझ ढोता  ही रहा परिवार का
एक बच्चे ने भली  सँवारी ज़िन्दगी

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2015 at 6:43am

आ0 भाई गुमनाम जी सक्रिय सदस्य मनोनीत किए जाने पर कोटि कोटि बधाई . आपकी सक्रियता इसी प्रकार बनी रहे यही कामना है

Comment by maharshi tripathi on March 18, 2015 at 9:34pm

बोझ ढोता  ही रहा परिवार का 
एक बच्चे ने भली  सँवारी ज़िन्दगी ,,,,,,वाह सर बेहद उम्दा गजल कही है आपने ,आपको हार्दिक बधाई |

Comment by somesh kumar on March 18, 2015 at 7:12pm

जैसा की विशेषज्ञों ने ईंगित किया ,कुछ कमियों के साथ एक भावपूर्ण गज़ल 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 18, 2015 at 10:11am

आदरणीय गुमनाम जी बेहतरीन गज़ल है बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2015 at 9:40pm

आदरणीय गुमनाम भाई , गज़ल अच्छी हुई है , बधाइयाँ । आ. मिथिलेश भाई की सलाहों पर गौर कीजियेगा ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 17, 2015 at 7:54pm

दोस्तों धन्यवाद ............. अरे मैं इतनी ज्यादा गलती कर गया माफ़ी चाहता हूँ .............. आगे से पूरा ध्यान दूंगा .........

Comment by Hari Prakash Dubey on March 17, 2015 at 7:43pm

आदरणीय गुमनाम जी, खूबसूरत ग़ज़ल , बधाई !

Comment by Shyam Narain Verma on March 17, 2015 at 3:40pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई!
Comment by Shyam Mathpal on March 17, 2015 at 12:24pm

Aadarniya Gumnami Ji,

Jindagi par sundar rachna ke liye badhai.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 17, 2015 at 10:03am

दर ब दर भटके बिचारी ज़िन्दगी 
मौत से भी देखो हारी ज़िन्दगी ............ सुन्दर मतला 

आसुओं में रही यूँ वो तर ब तर .......... आसुओं में  यूँ  रही वो तर ब तर
इसलिए तो लगती खरी ज़िन्दगी ......... इसलिए तो लगती खारी ज़िन्दगी

मांगती ही रहती है साँसे सदा ......... मांगती रहती है साँसे ही सदा
हर बशर की है भिखारी ज़िन्दगी ..... हर बशर की है भिखारी ज़िन्दगी 

ख़त्म गर्भों में हुई जो धडकनें 
अब कहाँ है वो कुंवारी ज़िन्दगी ....... वाह वाह 

बोझ ढोता  ही रहा परिवार का ..........बोझ ढोता  ही रहा परिवार का 
एक बच्चे ने भली  सँवारी ज़िन्दगी ......... एक बच्चे ने  सँवारी ज़िन्दगी 

बधाई इस ग़ज़ल पर ... आदरणीय गुमनाम सर बिना तक्तीअ के जल्दबाजी में पोस्ट कर दी आपने ग़ज़ल 

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