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ग़ज़ल -नूर 'मैं काफ़िर हूँ प् ना-शुक्रा नहीं हूँ'

१२२२/१२२२/१२२ 

किसी की आँख का क़तरा नहीं हूँ
ग़ज़ल में हूँ मगर मिसरा नहीं हूँ.
.
न जाने क्या करूँगा ज़िन्दगी भर  
तेरे सदमे से मैं उबरा नहीं हूँ.
.
अना से आपकी टकरा गया था
मैं टूटा हूँ मगर बिखरा नहीं हूँ.
.
खुदाया हश्र पर नरमी दिखाना
मैं काफ़िर हूँ प् ना-शुक्रा नहीं हूँ.
.
सफ़र में हूँ, कोई सूरज हो जैसे
कहीं भी एक पल ठहरा नहीं हूँ.
.
तराशेगी मुझे कुछ और क़िस्मत
अभी पूरी तरह निखरा नहीं हूँ.
.
सुखाती हैं नमी दिल की, हवाएँ
समंदर हूँ मगर गहरा नहीं हूँ.
.  
मैं पूरी तौर पे बिगड़ा नहीं था
मैं पूरी तौर पे सुधरा नहीं हूँ.
..
मैं सुनता हूँ तेरी हर एक धड़कन
मेरे नादान दिल! बहरा नहीं हूँ.
.  
बताऊँ ख़ामियाँ कैसे मैं तेरी
मैं अपने आप से गुज़रा नहीं हूँ.
.
भिगो दूँ आ तुझे बाहों में लेकर
बरसता अब्र हूँ सहरा नहीं हूँ.  
.
नूर 
मौलिक / अप्रकाशित 

Views: 659

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 31, 2015 at 2:00pm

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2015 at 5:56am

वाह ! क्या कहने आ0 नीलेश भाई , कोटि कोटि बधाई .

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 30, 2015 at 8:10pm

शुक्रिया आ. हरी प्रकाश जी ...अभी मत थकिये...इससे मुझे हौसला मिलता है 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 30, 2015 at 8:01pm

आदरणीय निलेश जी , अब तो बधाई देते देते थक गया हूँ , पर फिर से लीजिये इस शानदार रचना पर ! हा हा ..सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 30, 2015 at 10:44am

शुक्रिया शिज्जू भाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 29, 2015 at 12:54pm

आपकी जितनी ग़ज़लें पढ़ता हूँ उतनी शिद्दत से आपका फैन होता जाता हूँ बेहतरीन ग़ज़ल है किस शे'र को बेहतर कहूँ हर शे'र पर बस वाह वाह है निलेश भाई हर शे'र के लिए दाद हाज़िर है

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 28, 2015 at 8:15pm

शुक्रिया आ. डॉ. साहब. आप जैसे विचारवान लेखक से दाद मिलने से अभिभूत हूँ 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 28, 2015 at 8:12pm

शुक्रिया आ. वंदना जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 28, 2015 at 8:12pm

शुक्रिया आ. श्याम जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 28, 2015 at 6:47pm

आदरणीय नूर जी

अब जब गजल में हाथ पैर आजमा रहा हूँ तो इसकी गहराई कुछ जादा ही समझ में आरही है . आप तो  शिखर पर है . आपके  शेरो में सम्पूर्णता देखने को मिलती है . हर शेर बाकमाल .

 

मैं पूरी तौर पे बिगड़ा नहीं था
मैं पूरी तौर पे सुधरा नहीं हूँ.
..

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