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ग़ज़ल :- जैसे.मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है

बह्र :- मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ऊलुन


सच बोल रहा हूँ तो ये महसूस हुवा है
जैसे मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है

समतों क तअय्युन है न मंज़िल का पता है
इंसान मशीनों की तरह भाग रहा है

ठहरे हुए पानी पे कोई नाव रुकी है
इक गीत फ़ज़ाओं में अभी गूंज रहा है

इस हद पे हैं तहज़ीब की मिटती हुई क़दरें
रिश्तों को ज़मीनों की तरह बाँट दिया है

जिस दिन से दरिन्दों की सिफ़त आई है इसमें
इंसान ख़ुद अपना ही लहू चाट रहा है

फैले हुए हाथों पे "समर" तंज़ न करना
क्या जानिये बेचारे पे क्या वक़्त पड़ा है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 1076

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Comment by Samar kabeer on April 13, 2015 at 10:21am
जनाब शिज्जू "शकूर" जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ,
Comment by Samar kabeer on April 13, 2015 at 10:19am
जनाब श्री सुनील जी,आदाब,ज़र्रा नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 13, 2015 at 10:17am
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 12, 2015 at 5:22pm
इस हद पे हैं तहज़ीब की मिटती हुई क़दरें
रिश्तों को ज़मीनों की तरह बाँट दिया है
जनाब आदरणीय समर कबीर साहब , बहुत उम्दा, बधाई, सादर।
Comment by shree suneel on April 12, 2015 at 4:24pm
सच बोल रहा हूँ तो ये महसूस हुआ है
जैसे मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है
सच्ची बात सर. खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाईयां.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 12, 2015 at 12:49pm

जनाब समर कबीर साहब बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है दिली दाद कुबूल फरमायें

कृपया ध्यान दे...

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