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ग़ज़ल -- मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे

अरकान : २१२२-११२२-११२२-२२

मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे
दिल-ए-रेज़ा से शबो रोज़ धुआँ सा उठ्ठे

ये तो मैं हूँ जो ग़मे जाँ से अभी वाबस्ता
मेरे हालात में तो कोई भी घबरा उठ्ठे

झूठ ही झूठ अदालत में दिखाई देता
सच की जानिब से भी तो कोई जियाला उठ्ठे

भूख से मौत के आगोश में जो पहुँचा है
अब न मुफ़लिस का वो सोया हुआ बच्चा उठ्ठे

दुख़्तरे रज़ के तलबगार सभी हैं साक़ी
बस तेरी बज़्म में इक ज़िक्र-ए-पियाला उठ्ठे

लोग दाँतों तले उँगली को दबा लेंगे 'दिनेश'
तेरे किरदार से थोड़ा भी जो पर्दा उठ्ठे

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by दिनेश कुमार on April 16, 2015 at 3:44pm
हौसला अफज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय केवल प्रसाद जी।
Comment by वीनस केसरी on April 16, 2015 at 12:55am

खूब उस्तादाना ग़ज़ल हुई है ..
जिंदाबाद भाई
दिल खुश कर दिया

Comment by Hari Prakash Dubey on April 15, 2015 at 10:56pm

  आ. दिनेश कुमार जी, सुन्दर ग़ज़ल ,हार्दिक बधाई आपको !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 5:08pm

आ० दिनेश जी

बहुत उम्दा गजल कही आपने . सादर .

Comment by नादिर ख़ान on April 15, 2015 at 1:01pm

आदरणीय दिनेश जी उम्दा गज़ल कही आपने दिल खुश हो गया । बहुत बहुत मुबारकबाद ....

अदरणीय समर साहब ने जो अड्वाइस दी है शेर मे चार चाँद लगा दिये है कमाल की पारखी नज़र है समर भाई ....

Comment by shree suneel on April 15, 2015 at 12:56am
दुख़्तरे रज़ के तलबगार सभी हैं साक़ी
बस तेरी बज़्म में इक ज़िक्र-ए-पियाला उठ्ठे"
क्या बात! बहुत खूब! बाकी के अशआर भी शानदार हैं आ0 दिनेश जी. बधाई
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 14, 2015 at 10:58pm

आ० दिनेश सरजी खुबसूरत गजल पर दिली दाद कबूल करें!

Comment by दिनेश कुमार on April 14, 2015 at 5:48pm
हौसला अफ़्ज़ाई के लिये दिल से आभार आदरणीय समर कबीर सर जी। मशविरा देने में बिल्कुल भी संकोच न किया करें आदरणीय। आप को पूरा हक़ है कि आप को अगर किसी भी मिसरा में जरा सी भी गलती या सुधार की गुज़ाइश लगे, तो मुझे सुधार दें।
वाकई मिसरे में सुधार अपेक्षित था। हार्दिक धन्यवाद सर जी।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2015 at 4:39pm

क्या बात है बंधू, सभी अशआर एक से बढ़कर एक हुए हैं, मैं भी आदरणीय समर साहब के इस्लाह से सहमत हूँ, बधाई प्रेषित है इस खुबसूरत ग़ज़ल पर.

Comment by Nidhi Agrawal on April 14, 2015 at 2:35pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय दिनेश जी 

भूख से मौत के आगोश में जो पहुँचा है
अब न मुफ़लिस का वो सोया हुआ बच्चा उठ्ठे  - बहुत ही उम्दा शेर 

ख़्तरे रज़ के तलबगार सभी हैं साक़ी
बस तेरी बज़्म में इक ज़िक्र-ए-पियाला उठ्ठे - लाजवाब 

बहुत सुन्दर 

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