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कौन हो ? रो क्यों रही हो? - गाँव के बाहर बैठी उस स्त्री से बाल्या ने पूछा 

"शहर शहर घूम आई ..धुवें से काली काली हो गयी..  मैं बरसना चाहती हूँ लेकिन सब ने बहाना कर के भगा दिया ..कहाँ जाऊं" उसने रोते रोते कहा

अरे माई . कितना इंतज़ार करवाया .. पिछले दो साल से तुम नहीं आयीं.. उस साल बापू ने रो रो कर इसी पेड़ से लटक कर जान दे दी .. पिछले साल माँ ने कर्ज लेकर बीज बोये और फिर भूखी ही मर गयी... तू यहाँ बरस खेतों पे... अबकी फसल मैं दोनों का श्राद्ध करूँगा सच्ची 

और बारिश उमड़ घुमड़ कर बरस ली 

निधि 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 16, 2015 at 6:20pm

समसामयिक  विषय पर प्रभावपूर्ण लघुकथा के  लिए  बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2015 at 3:35pm

सापेक्ष विषय पर संवाद शैली में रचनाकर्म के लिए अछूता व्यवहार ..

बहुत खूब !

बधाइयाँ और शुभकामनाएँ

Comment by Hari Prakash Dubey on April 15, 2015 at 10:49pm

आदरणीया वंदना जी की बातों से सहमत ....पिछले साल कर्ज लेकर बीज बोये और भूखी ही मर गयी...देखए यहाँ  कुछ छूट रहा है ...फिर से प्रयास करिए सुन्दर लघु कथा निकल कर आएगी ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 15, 2015 at 10:43pm

एक बहुत अच्छे सामयिक विषय पर आपने लिखा है निधि जी ,थोड़े से सुधार से बेहतर होगी अपेक्षा है 

Comment by vandana on April 15, 2015 at 9:17pm

 विषय अच्छा चुना  है आपने पर  कुछ शब्द छूटे हुए से लग रहे हैं एक बार फिर से देखिएगा आदरणीया 

Comment by Madanlal Shrimali on April 15, 2015 at 5:47am

किसानो की हालत पर सुन्दर लघु कथा.

कृपया ध्यान दे...

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