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ग़ज़ल -नूर - कुछ और मुझ में जीने की हसरत बढ़ा गया

गागा ल/गा लगा/लल गागा/ लगा लगा   

कुछ और मुझ में जीने की हसरत बढ़ा गया

वादा किया था आने का, सचमुच में आ गया.
.
इक रोज़ मुझ से कहते हुए “ख़ूब लगते हो”
वो अपनी आँख का मुझे काजल लगा गया.
.
काफ़िर अगर जो मैं न बनूँ  और क्या बनूँ ?
दिल के हरम को छोड़ के मेरा ख़ुदा गया.
.
उट्ठा मैं हडबड़ा के टटोला इधर उधर,
ख़्वाबों में कौन आया, जगाया, चला गया. 
.
पत्ते झडे जो पक के करे उन का सोग कौन  
अफ़सोस है खिज़ा को... कि पत्ता हरा गया.  
.
मेरी दुआएँ हैं कि उसे मंज़िलें मिलें
जो मुझ से राह पूछ के मुझ को गिरा गया.
.
जुगनू था “नूर” और तो क्या उस के बस में था
लड़ना वो तीरगी से अगरचे सिखा गया. 
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 26, 2015 at 2:28pm

शुक्रिया आ. श्री सुनील जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 26, 2015 at 2:27pm

शुक्रिया आ. दिनेश भाई जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 25, 2015 at 9:11pm

आ0 नीलेश भाईजी,  इस मुकम्मल ग़ज़ल पर दिल से दाद कुबूल करे.

Comment by Samar kabeer on May 25, 2015 at 3:28pm
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,ख़ूबसूरत,मुकम्मल और शानदार ग़ज़ल सुनकर दिल बाग़ बाग़ हो गया,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by narendrasinh chauhan on May 25, 2015 at 1:06pm

बहुत खूब ! दाद कुबूल करें

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 25, 2015 at 10:17am
बहुत खूब नीलेश जी, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल करें।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 25, 2015 at 12:45am

बहुत सुन्दर ! हार्दिक बधाई आदरणीय !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 24, 2015 at 11:18pm

आदरणीय नीलेश जी इस मुकम्मल ग़ज़ल पर दिल से दाद हाज़िर है 

सभी अशआर दिल लूट गए 

आपका कमाल है ये  लाज़वाब ग़ज़ल 

दुआएं ढेर सारी 

Comment by shree suneel on May 24, 2015 at 11:08pm
कुछ और मुझ में जीने की हसरत बढ़ा गया
वादा किया था आने का, सचमुच में आ गया.. ... क्या बात है!
आदरणीय निलेश जी.,शानदार ग़ज़ल.. खूबसूरत ग़ज़ल..
भईई मज़ा आ गया.

उट्ठा मैं हडबड़ा के टटोला इधर उधर,
ख़्वाबों में कौन आया, जगाया, चला गया. ख़ूब.. ख़ूब
हार्दिक बधाई आपको आदरणीय...
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2015 at 7:55pm
हर शे'र पढ़ने के बाद मुँह से खुद ब खुद हयी शाबाश निकला है। मक़ते की फिर भी बात ही अलग है। वाह वाह आ. निलेश जी, लाजवाब ग़ज़ल ... !!

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