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सपनों के झिलमिल से जुगनू (एक गीत).............डॉ० प्राची सिंह

सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...

 

नन्हें पर हैं, पर भोला मन

नभ छू ले करता अभिलाषा,

कंटीले तारों की जकड़न

देगी केवल हाथ हताशा,

अन्धकार नें बरबस नोचे परियों के भी पंख सुनहरे...

सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...

 

सपनों को मंज़ूर हुआ कब 

ढुलक आँख से झरझर बहना,

हँसकर स्वीकृत किया उन्होंने 

सीपी में मोती बन रहना,

सागर ने अपने सीने में राज़ छुपाए हैं कुछ गहरे...

सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे ...

जुगनू की लौ बने सितारा

जंग अँधेरे से जारी है,

दृढ़ आधार मिले सपनों को

कण-कण इसकी तैयारी है,

स्याह अमावस जगमग कर दें, चीरें अन्धकार के पहरे...

सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by shree suneel on June 8, 2015 at 1:18am
भावनाओं से भरी सुन्दर, आकर्षक प्रस्तुति आदरणीया. हार्दिक बधाई आपको इस गीत के लिए.
Comment by Dr. Vijai Shanker on June 6, 2015 at 10:27pm

सपनों को मंज़ूर नहीं पर
ढुलक आँख से झरझर बहना,
हँसकर स्वीकृत उन्हें हमेशा
मोती बन सीपी में रहना,
बहुत सुन्दर, भावपूर्ण, आदरणीय सुश्री डॉo प्राची सिंह जी, बधाई, सादर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 6, 2015 at 2:43pm

आ० गिरिराज जी,आपने एक दम सही पहचाना जंग का बिंदु बिलकुल नहीं दिखा इस कारण मात्रा साधने का मशवरा  दे बैठी उस वक़्त थोडा जल्दी में भी थी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 6, 2015 at 2:09pm

आदरणीया प्राची जी , बहुत मन भावन  गीत रचना हुई  है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ।  

मुझे लगता है ,  आप  -- जंग अँधेरे से जारी है , कहना चाह रहीं है , जिसे आ. राजेश जी , जग अँधेरे से जारी है , पढ़ गईं है , इसी लिये एक मात्रा कम गिन रहीं हैं , और अँधियारा करने की सलाह  दे रहीं है , क्या सच है ? बताइयेगा । 

Comment by maharshi tripathi on June 5, 2015 at 7:40pm

इस सुन्दर गीत पर आपको हार्दिक बधाई आ.Dr.Prachi Singh जी |

Comment by Shyam Narain Verma on June 5, 2015 at 3:45pm
वाह आदरणीया बहुत ही सुन्दर भाव ///हार्दिक बधाई स्वीकारें  
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 5, 2015 at 1:46pm

महनीया प्राची जी

   आप देर से ब्लॉग पर आती है पर जब आती है तो छा जाती हैं .क्या सुन्दर गीत रचा है ---पहले जुगनू की  बात फिर सपने की बात और अंत में अन्धकार से लड़ने की बात . आ० राजेश जी बड़ी विज्ञ और जानकार हैं पर यहाँ जो विकल्प उन्होंने सुझाया है  वह् गीत  की आत्मा से न्याय कर पायेगा इसमें मुझे संदेह् है , मैं  दीदी के विकल्प का सम्मान करते हुए उनसे छमा चाहते हुए  कहना चाहूँगा की मेरे विचार से आपने जो लिखा है वही अधिकु उपयुक्त है -------------- स्याह अमावस जगमग कर दें --- यहाँ दें के स्थान पर दे उपयक्त है  पर यह टाईप त्रुटि हो सकती है. इस कविता के लिया आपको बहुत बहुत बधायी. सादर .  

Comment by Sushil Sarna on June 5, 2015 at 1:35pm

सपनों को मंज़ूर नहीं पर
ढुलक आँख से झरझर बहना,
हँसकर स्वीकृत उन्हें हमेशा
मोती बन सीपी में रहना,
सागर ने अपने सीने में राज़ छुपाए हैं कुछ गहरे...
सपनों के झिलमिल से जुगनू पलकों पर पल भर आ ठहरे ...

वाह आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी वाह … बहुत ही मासूम,सुंदर और गहन भावों को अभिव्यक्त करता प्यारा सा गीत .... हार्दिक बधाई बधाई स्वीकार करें आदरणीया जी।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 5, 2015 at 12:17pm

बहुत सुन्दर गीत हुआ है आ० प्राची जी! हार्दिक बधाई!

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2015 at 12:10pm

मनमोहक मुखड़ा लेकर बहुत सुन्दर गीत लिखा है प्रिय प्राची जी ,बहुत बहुत बधाई ,अंतिम बंद में ---जंग अँधेरे से जारी है,की जगह ---जग अँधियारे से ज़ारी है करें तो लय बेहतर बन रही है मेरे ख़याल से .

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