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जाति आधारित जनगणना : कुछ दोहे

राष्‍ट्र वाद पर हो रही, जाति वाद की मार ।

ज़हर  घोलने के  लिये, सहमत है  सरकार ।।

 

ज़हर जाति का कर रहा, जनमत पूर्व प्रचार ।

भला  नहीं  आवाम  का,  डालेगी  ये  रार ।।

 

जनगणना के आंकड़े, नहीं राष्‍ट्र अनुकूल ।

भूल गये इतिहास क्‍यूँ , बंग भंग का मूल ।।

 

जांत पांत की धारणा, संख्‍या सोच अजीब ।

निर्धनता से जूझ कर , संभला कहां गरीब ।।

जाति प्रथा का नाश हो, सबकी इक पहचान ।

भारत के सब नागरिक, सारे है इन्‍सान ।।

 

( मौलिक एवं अप्रकाशित )

 

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Comment by Ravi Shukla on July 23, 2015 at 3:23pm

आप सभी को दोहे पंसद आये । ह्रदय से आभार

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 22, 2015 at 9:18pm

सामयिक विषय पर उत्तम दोहे आदरणीय रवि शुक्ल जी!

Comment by maharshi tripathi on July 22, 2015 at 7:25pm

जांत पांत की धारणा, संख्‍या सोच अजीब ।

निर्धनता से जूझ कर , संभला कहां गरीब ।।,,,वाह ! बहुत बढ़िया आ. Ravi Shukla जी |

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 10:20am
आदरणीय बहुत ही सटिक विषय पर दोहें लिखे। दिल से दाद देता हूँ

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 21, 2015 at 11:12am

आ. रवि शुकला जी , सभी दोहे बहुत अच्छे लगे ! आपको हार्दिक बधाई दोहा वली के लिये ।

Comment by Ravi Shukla on July 21, 2015 at 9:59am

समादरणीय राजेश कुमारी जी एवं मिथिलेश जी

आभार आप विद्वतजन का

प्रयास को परामर्श देते रहें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 20, 2015 at 10:28pm

अच्छी दोहावली हुई है रवि शुक्ला जी,बधाई स्वीकारें . 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 20, 2015 at 5:53pm

आदरणीय रवि जी, बहुत बढ़िया दोहावली हुई है इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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