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ग़ज़ल: जब-जब किसी परिंदे ने पंख फड़फड़ाए - सुलभ

बहर - 22 12122 22 12122 

जब-जब किसी परिंदे ने पंख फड़फड़ाए
वो बदहवास होकर ख़ंजर निकाल लाए

दुनियाँ की चाल चलनी जिस रोज़ से शुरू की
अपनी निगाह से हम गिर के फिर उठ न पाये

वो जानते हैं उनका भगवान जानता है
कानून से भले ही सब जुर्म बख्शवाये

रोज़े खतम न हों तो, क्या चाँद का निकलना
हम ईद मान लेंगे जब चाँद मुस्कुराये

मंजि़ल थी क़ामयाबी, ऊँचा महल अटारी
ईमान बेच आये, ईंटें ख़रीद लाये

हर फूल के बदन को घावों से भर दिया है
नाख़ून को थे नाहक़ ही दस्तख़त सिखाये

अच्छे दिनों की खातिर करतब किये हज़ारों
जब भी बुरे दिन आये, आये बिना बुलाये

मौलिक और अप्रकाशित

-------- सुलभ अग्निहोत्री

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Comment by pratibha pande on August 12, 2015 at 9:41pm
'दुनिया की चाल चलनी जिस रोज़ से शुरू की ,अपनी निगाह ......'सशक्त रचना ,बधाई प्रेषित करती हूँ आपको आ० सुलभ जी
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 12, 2015 at 7:49pm

मंजि़ल थी क़ामयाबी, ऊँचा महल अटारी
ईमान बेच आये, ईंटें ख़रीद लाये

मुझे ज्यादा अच्छी लगी वैसे हर शेर अपनी जगह पर अपनी आवाज खुद बुलंद कर रहा है. सादर सुलभ अग्निहोत्री जी!

Comment by Sulabh Agnihotri on August 12, 2015 at 12:52pm

बहुत-बहुत आभार laxman dhami जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 12, 2015 at 12:52pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 12, 2015 at 12:51pm

बहुत-बहुत आभार Dr Ashutosh Mishra जी !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2015 at 11:07am

अच्छे दिनों की खातिर करतब किये हज़ारों
जब भी बुरे दिन आये, आये बिना बुलाये

आ0 सुलभ भाई , बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2015 at 9:19pm

आदरणीय सुलभ भाई , वाह ! क्या गज़ल कही है , लाजवाब , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 11, 2015 at 6:13pm

मंजि़ल थी क़ामयाबी, ऊँचा महल अटारी
ईमान बेच आये, ईंटें ख़रीद लाये आदरणीय सुलभ जी इस बेहतेरीन ग़ज़ल के तहे दिल दाद स्वीकार करें ..उद्धृत शेर बेहद पसंद आया  सादर 

Comment by Sulabh Agnihotri on August 11, 2015 at 3:08pm

बहुत-बहुत आभार Ravi Shukla जी !

Comment by Ravi Shukla on August 11, 2015 at 1:17pm

आरणीय सुलभ जी

क्‍या बात है

रोज़े खतम न हों तो, क्या चाँद का निकलना
हम ईद मान लेंगे जब चाँद मुस्कुराये ... शान दार शेर दाद कुबूल करें

हर फूल के बदन को घावों से भर दिया है
नाख़ून को थे नाहक़ ही दस्तख़त सिखाये ...इस शेर के कथ्‍य के लिये दिली दाद कुबूल करें

अच्‍छी ग़ज़ल । आभार

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