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होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ।
है असम्भव आदतों को छोड़ दे पाना यहाँ।।

किस तरह तन्हा गुज़ारें ज़िंदगी का ये सफ़र।
नींद आँखों में नहीं कैसे हो सो जाना यहाँ।।

राह सुनी ही रही अब तक निगाहें हैं खुली।
आज भी हासिल रहा उनका नहीं आना यहाँ।।

चैन का आलम न पूछें नब्ज़ में तूफ़ान है।
है कठिन बरसात के मौसम को रुकवाना यहाँ।।

हसरतों की नाव सागर के हवाले छोड़ना।
एक मांझी की ख़ता मुश्किल है बतलाना यहाँ।।

कोई उनको बोलिये नैनों के सागर के बिना।
इस तरह "पंकज" का अब मुश्किल है खिल जाना यहाँ।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2015 at 9:50am
कान्त रॉय मैम,रविशुक्ल सर, गिरिराज सर और हर्ष सर आप सभी लोगों का आभार कि आप लोगों नें मेरा उत्साहवर्धन किया; मैं स7धरोंनके लिए पयसरत हूँ बस आप लोगों का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहे।
Comment by Harash Mahajan on August 27, 2015 at 8:55am
आदरणीय पंकज जी अच्छे भावों में कही है आपने ये ग़ज़ल । "किस तरह तनहा गुजारें..........सो जाना यहां" अति सूंदर । दाद कबूल कीजियेगा ।सादर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 27, 2015 at 7:35am

आदरणीय , बहुत अच्छा प्रयास   हो रहा है , आपको हार्दिक बधाई । बह्र  का उल्लेख कर दिया करें , ताकि पाठको को आसानी हो । आ. मिथिलेश भाई जी की सहाल उचित है , खयाल कीजियेगा ।

Comment by Ravi Shukla on August 26, 2015 at 2:01pm

आदरणीय पंकज जी अच्‍छी ग़ज़ल कही है आपने कुछ कमी रह गई थी उसके बारे में पहले ही चर्चा हो चुकी है । आभार

Comment by kanta roy on August 25, 2015 at 9:17am

हसरतों की नाव सागर के हवाले छोड़ना। एक मांझी की ख़ता मुश्किल है बतलाना यहाँ।।....... बहुत खूब कही है ये बात भी आदरणीय पंकज कुमार जी ..... बधाई हो

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 24, 2015 at 12:30pm
सादर आभार वामनकर सर; मैं आप लोगों से पहले क्यों नहीं जुड़ा ?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 24, 2015 at 11:41am

आदरणीय पंकज जी, आपका मतला है-

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ।
है असम्भव आदतों को छोड़ दे पाना यहाँ।।

इसमें 'वहाँ' और 'यहाँ' पर काफिया निर्धारित हो रहा है. इसलिए इसे सुधार कर काफिया आना करने के लिए पहले मिसरे में भी 'वहाँ' को  'यहाँ' करना होगा-

होश खोने की तलब लेकिन न मयखाना यहाँ
है असम्भव आदतों को छोड़ दे पाना यहाँ।।

वैसे 'छोड़ दे पाना' भी व्याकरणिक त्रुटी लग रही है किन्तु थोड़ा सशंकित हूँ. सादर 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 24, 2015 at 10:27am
वामनकर सर बदल दिया
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 24, 2015 at 10:22am

पंकज जी

सुन्दर प्रयास  !

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:20pm
आदरणीय समर वामनकर सर आप दोनों लोगों को प्रणाम। मैं ग़ज़ल/ गीत की पाठशाला का एक विद्यार्थी मात्र हूँ।
एक वादा ज़रूर है कि आप लोगों द्वारा और ओबीओ परिवार के सुझावों पर अवश्य कार्य करूंगा।

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