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कबीरा, सूर, मीरा और तुलसीदास रखता हूँ। (ग़ज़ल)

1222---1222---1222-1222

 

मैं घर से दूर आया हूँ मगर कुछ ख़ास रखता हूँ।

तुम्हारी याद की ताबिश हमेशा पास रखता हूँ।

 

कभी वट पूजती हो तुम, दिखा के चाँद को चलनी

मुझे अवसर नहीं ऐसे मगर उपवास रखता हूँ।

 

मैं शबनम देख लेता हूँ तुम्हारी याद आती है

यही ख्वाहिश लिए मै जेब में अब घास रखता हूँ।

 

किसी भी लक्ष्य को पाकर, ख़ुशी से झूमता लेकिन

सफलता में भी अंतिम सत्य का आभास रखता हूँ।

 

कभी मंदिर या मस्जिद के बुलावे पर नहीं जाता

परम सत्ता पे मैं लेकिन बहुत विश्वास रखता हूँ।

 

चलो माना कि दरिया हो, मगर तहजीब मत भूलों

सुनो मैं भी समंदर से जियादा प्यास रखता हूँ।

 

कभी मैंने नहीं चाही खुशामद या सिफत लेकिन

शगुफ्ता इक तबस्सुब की जरा सी आस रखता हूँ।

 

हथेली पर मेरे कल की तमन्ना रक्स करती है

मगर मैं भी हमेशा हाथ में इतिहास रखता हूँ

 

सुनो, सुन के बताओं क्या इसी को दर्द कहते है?

तुम्हारे सामने अपने सभी अहसास रखता हूँ।

 

मैं ग़ालिब मीर पढता हूँ, ग़ज़ल के साथ में लेकिन

कबीरा, सूर, मीरा और तुलसीदास रखता हूँ।

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by मिथिलेश वामनकर on September 1, 2015 at 12:02am

आदरणीय सुशील सरना सर, ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by Samar kabeer on August 31, 2015 at 11:28pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,कमाल ही कमाल ,शानदार ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

तबस्सुब-तबस्सुम ।
Comment by मोहन बेगोवाल on August 31, 2015 at 10:57pm

आदरणीय मिथिलेश जी, आप जी की गज़ल पढ़ते हुए कहाँ खो गया , पता ही न चला , एक बहुत ही अर्थ भरपूर लाजवाब गज़ल के लिए बधाई कबूल करें  

Comment by Harash Mahajan on August 31, 2015 at 9:35pm
आ0 मिथिलेश वामनकर जी निशब्द हूँ ....
"मैं ग़ालिब मीर पढता हूँ ग़ज़ल के साथ लेकिन,
कबीरा सूर मीरा और तुलसी दास रखता हूँ ।"....वाह बेहद खूबसूरत । दिली दाद । सादर !!!
Comment by मनोज अहसास on August 31, 2015 at 9:11pm
कभी मैंने नहीं चाही खुशामद या सिफत लेकिन
शगुफ्ता इक तबस्सुब की जरा सी आस रखता हूँ।

बहुत खूब सर
बधाई
सादर
Comment by Sushil Sarna on August 31, 2015 at 7:10pm

सुनो, सुन के बताओं क्या इसी को दर्द कहते है?
तुम्हारे सामने अपने सभी अहसास रखता हूँ।

वाह आदरणीय मिथिलेश जी वाह हर शेर इस ग़ज़ल का नगीना है … बहुत खूब .... इस दिलकश ग़ज़ल की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 31, 2015 at 5:11pm

आदरणीय शिज्जु भाई जी, ग़ज़ल पर आपका अनुमोदन पाकर मुग्ध हूँ. हार्दिक आभार  आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 31, 2015 at 4:01pm
वाह क्या खूब ग़ज़ल लाजवाब हर शेर के लिए दाद हाज़िर है

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