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सरकार पर व्यंग्य बाण " अज्ञात "

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती,                  
यदि वोट की खातिर वो,                             

दोनों हाथ से धन न लुटाती।                  

तो देश की सारी व्यवस्था,                       

इस तरह न चरमराती।                                

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती।                                            
छोड़ निंदा रस कहीं,                          

गर ध्यान देती दाल पर,                        

बात सच है,                                                        

तो नहीं , दाल दो सौ पार जाती।                 

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती,                        
देश की जनता भला,                             

खाये क्या, और क्या पिये,                      

बढ़ती हुई मँहगाई में,                                  

होती दुखी न तिलमिलाती।                    

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती।
अजय शर्मा  " अज्ञात  "।                       

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 564

Comment

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2015 at 10:50am
बहुत सुंदर कटाक्ष समसामयिक हालात पर , जागरूक करते हुए।बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय अजय कुमार शर्मा जी इस सार्थक सटीक रचना के लिए।
Comment by Ajay Kumar Sharma on November 1, 2015 at 10:36am

आदरणीय राहिला जी, सतविंदर जी आप सभी का धन्यवाद। हमारे प्रयास पर आपकी टिप्पणियों से स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। आभार।।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 1, 2015 at 6:50am

sunder prstuti

Comment by Ajay Kumar Sharma on October 29, 2015 at 6:17pm

परम आदरणीय आप सभी विद्वानों का हृदय से धन्यवाद।।

Comment by maharshi tripathi on October 29, 2015 at 5:27pm

आ. Ajay Kumar Sharma जी अगर आपकी रचना सरकार के पास पहुच जाये तो निश्चित ही सरकार ध्यान देगी ,,,,इस रचना हेतु आपको बधाई |

Comment by Rahila on October 29, 2015 at 4:50pm
बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय अजय कुमार जी! बहुत बधाई आपको ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 29, 2015 at 3:04pm

आदरणीय अजय शर्मा जी वर्तमान परिदृश्य में एक सार्थक रचना हुई है इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

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