For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

221 2122  221 2122

रौशन हो दिल हमारा, इक बार मुस्कुरा दो 

खिल जाय बेतहाशा, इक बार मुस्कुरा दो 

 

पलकों की कोर पर जो बादल बसे हुए हैं
घुल जाएँ फाहा-फाहा, इक बार मुस्कुरा दो

 

आपत्तियों के रुत की कुछ है अजीब फितरत
समझो अगर इशारा, इक बार मुस्कुरा दो

 

मालूम है तुम्हें भी कितना कठिन समय है
फिर भी तुम्हारा कहना, ’इक बार मुस्कुरा दो’ !

 

पत्थर के इस शहर में जो धुंध इस कदर है
मिट जायेगा अँधेरा, इक बार मुस्कुरा दो

 

निर्द्वंद्व सो रहा है आगोश में समन्दर
बहका रहा किनारा, इक बार मुस्कुरा दो

 

अभिव्यक्ति ज़िन्दग़ी की - दीपक तथा अँधेरा !
अब जी उठे उजाला, इक बार मुस्कुरा दो

 

स्वीकार हो निवेदन, अनुरोध कर रहा है
ये रोम-रोम सारा.. इक बार मुस्कुरा दो
********************

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 1041

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 5, 2015 at 2:39pm

आदरणीय सौरभ सर, आपकी गज़ले बड़े अन्तराल के बाद पढने मिलती है, आपकी ग़ज़ल रात में ही पढ़ ली थी, कई बार.... लेकिन प्रतिक्रिया अभी निवेदित कर रहा हूँ. बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई है. आपकी ग़ज़लों का अंदाज़, भाषा शैली और शब्द चयन चकित करता है. एक एक शब्द मोती की तरह पिरोया हुआ लगता है. इस विधा में संस्कृतनिष्ट हिंदी के शब्दों का चमत्कृत करता प्रवाह और फारसीनिष्ठ शब्दों से गठजोड़ अद्भुत होता है. कहीं भी प्रवाह बाधित नहीं होता. अलबत्ता पहली बार में समझ भी नहीं आता कि ऐसा प्रयोग किया गया है. आपकी ग़ज़ल पढ़ते हुए ख़याल आया कि हिन्दुस्तानी ग़ज़ल दिशा पर जितने आलेख या इंटरव्यूह पढ़े है, उनमे कहीं गई बातों के सापेक्ष आपकी ग़ज़लों को पढ़ते हुए, उन बातों की महत्ता समझ आती है. इस ग़ज़ल का प्रत्येक शेर प्रभावित करता हुआ दिल में उतरता है. 'इक बार मुस्कुरा दो' रदीफ़ ने उस पर चार-चाँद लगा दिए. इस लाजवाब ग़ज़ल पर शेर दर शेर दाद हाज़िर है-

रौशन हो दिल हमारा, इक बार मुस्कुरा दो
खिल जाय बेतहाशा, इक बार मुस्कुरा दो ........... बढ़िया मतला

पलकों की कोर पर जो बादल बसे हुए हैं
घुल जाएँ फाहा-फाहा, इक बार मुस्कुरा दो.......... वाह वाह.... फाहा फाहा का जवाब नहीं!

आपत्तियों के रुत की कुछ है अजीब फितरत
समझो अगर इशारा, इक बार मुस्कुरा दो................ नजाकत से शेर कहा है. आपत्तियों के रुत का बढ़िया प्रयोग.

मालूम है तुम्हें भी कितना कठिन समय है
फिर भी तुम्हारा कहना, ’इक बार मुस्कुरा दो’ !.......... लाज़वाब शेर

पत्थर के इस शहर में जो धुंध इस कदर है
मिट जायेगा अँधेरा, इक बार मुस्कुरा दो............. बढ़िया शेर

निर्द्वंद्व सो रहा है आगोश में समन्दर
बहका रहा किनारा, इक बार मुस्कुरा दो........... बहुत खूब... बढ़िया शेर

अभिव्यक्ति ज़िन्दग़ी की - दीपक तथा अँधेरा !
अब जी उठे उजाला, इक बार मुस्कुरा दो............ जीवन को परिभाषित करता करता हुआ बढ़िया मिसरा-ए-उला हुआ है. अगर जीवन की अभिव्यक्ति दीपक तथा अँधेरा है तो दीपक का उजाला आपके मुस्कुराने से है. शानदार

स्वीकार हो निवेदन, अनुरोध कर रहा है
ये रोम-रोम सारा.. इक बार मुस्कुरा दो ................ वाह वाह रोम-रोम में उतर गया ये शेर

इस ग़ज़ल से गुजरते हुए यकीन हुआ जाता है कि ऐसे शेर कहना आपके बूते की ही बात है. फिर भी अभ्यास के क्रम में मेरा प्रयास भी जारी है. इस मार्गदर्शन करती ग़ज़ल ने उस दिशा में प्रयास हेतु सघनता से मुझे प्रेरित किया है. वैसे मेरा प्रयास जारी भी है लेकिन अब उस प्रयास को सघन करने की आवश्यक महसूस हो रही है.

इस उत्कृष्ट ग़ज़ल की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई और सादर नमन


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 5, 2015 at 1:29pm

क्या बात है , आदरनीय सौरभ भाई , बहुत बढिया ग़ज़ल हुई है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें । हरेक शे र की कहन मुग्धकारी है ।

आपत्तियों के रुत की कुछ है अजीब फितरत
समझो अगर इशारा, इक बार मुस्कुरा दो

 

मालूम है तुम्हें भी कितना कठिन समय है
फिर भी तुम्हारा कहना, ’इक बार मुस्कुरा दो’

निर्द्वंद्व सो रहा है आगोश में समन्दर
बहका रहा किनारा, इक बार मुस्कुरा दो   --- सिर्फ आप ही कह सकते हैं ऐसे शेर , दिल से पुनः बधाइयाँ इन अश आर के लिये ।

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2015 at 1:21pm

निर्द्वंद्व सो रहा है आगोश में समन्दर
बहका रहा किनारा, इक बार मुस्कुरा दो

अभिव्यक्ति ज़िन्दग़ी की - दीपक तथा अँधेरा !
अब जी उठे उजाला, इक बार मुस्कुरा दो

वाह आदरणीय सौरभ जी वाह … कितने खूबसूरत अहसासों से लबरेज़ अशआर कहे हैं आपने .... ''अब जी उठे उजाला '' के प्रयोग ने मंत्रमुग्ध कर दिया है … इस दिल दिलकश ग़ज़ल की प्रस्त्तुति के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें आदरणीय .... आपकी कल्पना की ऊंचाई को सादर _/\_

Comment by मनोज अहसास on November 5, 2015 at 6:00am
नमस्कार सर
इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको बहुत बहुत बधाई
सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"ग़ज़ल   बह्र ए मीर लगता था दिन रात सुनेगा सब के दिल की बात सुनेगा अपने जैसा लगता था…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१। * अवसर समानता का कहे…See More
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
" दोहा मुक्तक :  हिम्मत यदि करके कहूँ, उनसे दिल की बात  कि आज चौदह फरवरी, करो प्यार…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"दोहा एकादश. . . . . दिल दिल से दिल की कीजिये, दिल वाली वो बात । बीत न जाए व्यर्थ के, संवादों में…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service