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जालिम की दलीलें (लघुकथा )राहिला

"देखो,बच्चे बहुत थक गये है और तुम्हारी हालत भी खस्ता हो रही है । हम खच्चर कर लेते है । ये सुनते ही वो कर्कशा!सुपरिचित वाणी में कूकी-"वाह जी वाह!!फिर कैसी यात्रा?अरे थोड़ा बहुत कष्ट तो होता ही है।फिर मेरी सहेलियां कह रही थीं कि जो पुण्य पैदल वैष्णों देवी जाने में है वो...."उसने अपनी बात को वजनी बनाने में दुनिया की दलीलें दे डाली । मैं उसके स्वभाव से बहुत अच्छी तरह वाकिफ़ था,यात्रा में कोई बदमज़गी ना हो इसलिये हमने उसके आगे हथियार डाल दिये।और चल पड़े । हम खरगोश ना सही,परन्तु वो जरूर कछुये की चाल से आगे बढ़़ रही थी।लेकिन उसकी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी ।थोड़ी देर बाद जब हमने पीछे मुड़कर देखा तो वो दूर-दूर तक नजर नहीं आई।हम उसके इंतेजार में वहीं बैठ गये।लगभग दस मिनट बाद वो हमें दिखाई दी,कुछ बिलकुल नई ताजा तरीन दलीलों के साथ,शान से खच्चर पर सवार।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rahila on February 24, 2016 at 1:46pm
जी ,इस उबाऊ विषय के लिये माफी चाहूंगी, आदरणीय सर जी! और ध्यान रखूगीं इसकी पुनरावृत्ति ना हो, सादर ।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 24, 2016 at 10:11am

अच्छी लघुकथा है, लेकिन आप फिर से उसी कथनी-करनी में ही उलझ गईं राहिला जीI  

Comment by Rahila on November 20, 2015 at 11:58am
आदरणीय सौरभ सर जी !बहुत आभारी हूं आपकी कि आप मुझसे तनिक और की आशा रखते है । इसी तरह आपका मार्गदर्शन मिलता रहा तो और अच्छे से इस विधा को समझ पाऊंगी । सादर प्रणाम ।
Comment by Rahila on November 20, 2015 at 11:55am
बहुत आभार आदरणीय बैजनाथ सर जी! बहुत शुक्रिया । सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2015 at 11:01pm

लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया राहिलाजी. बहुत ही प्रभावी कथानक पर रचना हुई है. आवश्यकतानुसार चुटीलापन भी प्रभावी है. परन्तु, शैल्पिक तो नहीं, अलबत्ता प्रस्तुतीकरण तथा विन्यास की दृष्टि से इस कथा को तनिक और साधना आवश्यक प्रतीत हो रहा है.  जैसे, कर्कशा का कूकना भले ही कटाक्ष को ज़ाहिर करने केलिए लिखा गया हो लेकिन यह प्रयोग प्रभावित नहीं करता. लघुकथा की प्रभावी पंक्ति बहुत ही उम्दा बन पड़ी है. इस हेतु बधाइयाँ 

शुभ-शुभ

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 19, 2015 at 6:59pm

आदरणीया राहिला जी .....................बेहतरीन लघुकथा ..... बधाई|

Comment by Rahila on November 19, 2015 at 3:24pm
आदरणीय सुनील जी! आपकी टिप्पणी का बड़ा इंतेजार रहता है । मेरी रचना जैसी भी हो आपकी हौसला अफज़ाई का अंदाज जबरदस्त होता है । बहुत शुक्रिया आपका । सादर ।
Comment by Rahila on November 19, 2015 at 11:35am
आदरणीय सालिम साहब बहुत शुक्रिया आपका आपने मेरे रचना को तबज्जोह दी । आप सब की हौसला अफज़ाई ही है जो लिख रही हूं । बहुत आभार ।
Comment by Rahila on November 19, 2015 at 11:32am
आदरणीय सतविन्दर जी सादर आभार आपकी उपस्थिति मात्र हौसला दे जाती है । बहुत शुक्रिया आपका । सादर नमन ।
Comment by Rahila on November 19, 2015 at 11:29am
आदरणीया प्रतिभा दी, आपने रचना को सही समझा मैं यही कहना चाह रही थी कि कुछ लोग चित भी मेरी पट भी मेरी की तर्ज़ पर जिदगीं जीते है और दूसरों की ज़िंदगी दूभर कर देते है । बहुत आभार रचना का मर्म समझने के लिये । सादर ।

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