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डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’(गजल)

122    122    122    122
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डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा
लड़ो  जुगनुओं  का  सहारा  मिलेगा /1

हमेशा   नहीं   यूँ   अँधेरा मिलेगा
भले  ही रहे कम  उजाला मिलेगा /2

कहावत है तम की जहाँ बस्तियाँ हों
वहीं   दीपकों   का   बसेरा   मिलेगा /3

चलो  ढूँढते  हैं   उसे   रात  भर अब
कहीं तो तिमिर का किनारा मिलेगा /4

भटक जाओ गर तुम गगन को निहारो
बताता  दिशा   इक  वो  तारा  मिलेगा /5

फकत जागने की  करो कोशिशें अब
जगोगे  अगर   तो   सवेरा   मिलेगा /6

मौलिक व अप्रकाशित
© लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:39am

आ० भाई श्री सुनील जी पशंसा के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:38am

आ० भाई भाई मिथिलेश जी ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:36am

आ० भाई विजय जी प्रशंसा के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:35am

आ० भाई गोपालनारायण जी अपनी उपस्थिति से ग़ज़ल का मन बढ़ने के लिए हादिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:34am

आ० भाई गिरिराज जी उत्साहवर्धन के लिए आभार l

Comment by shree suneel on December 9, 2015 at 9:21pm
चलो ढूँढते हैं उसे रात भर अब
कहीं तो तिमिर का किनारा मिलेगा... क्या बात!

भटक जाओ गर तुम गगन को निहारो
बताता दिशा इक वो तारा मिलेगा... बहुत बढि़या
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ आपको. अन्य अशआर भी काबिले तारीफ़ हैं.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 7, 2015 at 4:29am

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी, बेहतरीन अशआर से सजी शानदार ग़ज़ल हुई है. ग़ज़ल के हर शेर का सकारात्मक भाव और आशावादी होने के लिए प्रेरित करना भा गया. बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर.

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 6, 2015 at 1:25pm
डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा
लड़ो जुगनुओं का सहारा मिलेगा /1
बहुत खूब , आदरणीय लक्षमण , बहुत बहुत बधाई , सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 6, 2015 at 12:13pm

डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा
लड़ो  जुगनुओं  का  सहारा  मिलेगा /-------------- बहुत सुन्दर धामी जी .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2015 at 10:59am

क्या बात है , आ. लक्ष्मण भाई खूब सूरत मतला हुआ है -
डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा
लड़ो  जुगनुओं  का  सहारा  मिलेगा  --  बहुत खूब

इस शे र  को अगर ऐसे कहें तो  -
चलो  ढूँढते  हैं   उसे   रात  भर अब
कहीं रोशनी का किनारा मिलेगा     (  तिमिर को ढूढ्ना मुझे ख़टक रहा है )

और ये शेर भी खूब कहा है

फकत जागने की  करो कोशिशें अब
जगोगे  अगर   तो   सवेरा   मिलेगा  --- वाह !  गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

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