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प्रतिशोध - ( लघुकथा ) –

प्रतिशोध -  ( लघुकथा  ) –

 "प्रधान जी, यह क्या देख रहा हूं!आज तो आप पंडित होकर भी ,अपने जानी दुश्मन,  हरिज़न विधायक गंगा राम  के बेटे को शराब और क़बाब की दावत  दे रहे थे और बराबर में साथ बैठा कर तीन पत्ती भी खिला रहे थे"!

"बाबूलाल, यह राजनीति है,तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी"!

"कोई काम करवाना है क्या विधायक जी से"!

"मैं उस कुत्ते  की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करता, उसकी वज़ह से तो मेरी विधायकी की सीट छिन गयी"!

"तो फ़िर इस दावत का क्या राज़ है"!

"इस राज़ को अपने तक ही रखो तो बता सकता हूं"!

"कैसी बात कर रहे हो प्रधान जी,आपको मुझ पर भरोसा नहीं,मैं तो आपका खास आदमी हूं"!

"तो सुन,किसी से दुश्मनी निकालनी हो तो उसकी औलाद को शराबी ,क़बाबी और ज़ुआरी बना दो"!

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 9:18pm

 हार्दिक आभार आदरणीय नीता कसार जी!

Comment by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 9:18pm

 हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी!

Comment by Nita Kasar on January 21, 2016 at 8:55pm
प्रतिशोध का एक रूप एेसा भी दुश्मन की कमज़ोर नस पर वार करना गाँव में दुश्मनी निकालने का यही तरीका होता है सारगर्भित कथा के लिये बधाई आद०तेजवीर सिंह जी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 21, 2016 at 7:44pm

क्या बात है , आदरनीय तेज़ वीर भाई , बहुत सही बात कही आपने ! आपको हार्दिक बधाइयाँ कथा के लिये ।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 2:11pm

हार्दिक आभार आदरणीय रवि प्रभाकर जी!एक अंतराल के बाद मेरी लघुकथा पर आपकी टिप्पणी मन को रोमांचित कर रही है!कृपा बनाये रखिये!पुनः आभार!

Comment by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 2:08pm

हार्दिक आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी!लघुकथा पर आपकी उपस्थिति बडी सुखद अनुभूति है!पुनः आभार!

Comment by Ravi Prabhakar on January 20, 2016 at 11:33pm

विकृत व दोगली मानसिकता पर गंभीर चोट करने में सफल रही आपकी प्रस्‍तुत लघुकथा। बधाई स्‍वीकार करें आदरणीय तेजवीर सर ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2016 at 9:02pm

आदरणीय तेजवीर जी, प्रतिशोध शीर्षक को सार्थक करती शानदार लघुकथा है. हार्दिक बधाई 

Comment by TEJ VEER SINGH on January 20, 2016 at 10:54am

हार्दिक आभार आदरणीय प्रतिभा पांडे जी!

Comment by pratibha pande on January 19, 2016 at 10:23pm

प्रतिशोध का ये तरीका जबर्दस्त है, बहुत अच्छी रचना बधाई स्वीकार करें आदरणीय तेजवीर जी 

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